09/08/2017

मण्डल और लालू

("भाई चंद्र भूषण सिंह यादव जी हमारे समाज के उन सजग साथियों में हैं जो बेबाकी से अपनी राय पयुक्त समय पर देते रहते हैं हम उअन्के इस विचार को उअन्के फेसबुक पेज से ले रहे हैं। " 
साभार 
-डॉ.लाल रत्नाकर )

मण्डल कमीशन के लिए लालू प्रसाद यादव जी ने खुद को दांव पर लगाया....
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 --चंद्र भूषण सिंह यादव 
चंद्र भूषण सिंह यादव 

मैं यह कहूँ कि "मण्डल कमीशन" के लिए लालू प्रसाद यादव जी ने खुद को दांव पर लगा दिया तो कोई अतिशयोक्ति न होगी क्योकि मैं 1990 के मंडल आंदोलन का गवाह हूँ और इसके लिए डंडे खाने से लेकर जेल जाने,दिल्ली/लखनऊ/गोरखपुर/देवरिया में प्रदर्शन/रैली/आन्दोलन करने में शामिल रहा हूँ।मैं मण्डल आंदोलन के दौर में देवरिया युवा जनता दल का जिलाध्यक्ष था इस नाते मण्डल आंदोलन में जिम्मेदारी कुछ ज्यादे ही थी और उस दौर की घटनाएं आज भी जेहन में बिलकुल तरोताजा हैं।


लालू प्रसाद यादव जी 1989 में बिहार का मुख्यमंत्री बनने कर बाद बिहार में दबे-कुचले लोगो को तेजी से उभार रहे थे।वे सदियों से दबाए गए लोगो मे उत्साह का संचार कर रहे थे।बिलकुल निचले पायदान पर खड़ी जातियों में नेतृत्व पैदा करने का कार्य बिहार में लालू जी कर रहे थे।दिल्ली में जनता दल की राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार सत्त्तासीन थी।वी पी सिंहः जी प्रधानमंत्री तो देवीलाल जी उप प्रधानमंत्री थे।चन्द्रशेखर सिंह जी प्रधानमंत्री न बन पाने से आहत थे लिहाजा वीपी सिंह जी को पदच्युत करने का लगातार अभियान जारी रखे हुए थे।धीरूभाई अंबानी जी चन्द्रशेखर जी के मित्र थे,वे चन्द्रशेखर जी को प्रधानमंत्री बनाने हेतु कुछ भी कर गुजरने पर आमादा थे।देवीलाल जी ने वीपी सिंह जी के विरुद्ध बिगुल फूंक दिया और वीपी सिंह जी की सरकार गिरने की तरफ अग्रसर हो गयी।लालू जी,शरद जी और रामविलास पासवान जी की तिकड़ी एक साथ थी।इन तीनो नेताओ ने वीपी सिंह जी से जनता दल के घोषणा पत्र में उल्लिखित मण्डल कमीशन की याद दिलाई और इसे लागू करने का सुझाव दिया।मैं धन्यवाद दूंगा वीपी सिंह जी को जिन्होंने अलोकप्रियता का ख्याल किये बगैर तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद 7 अगस्त 1990 को मण्डल लागू करने का ऐलान कर दिया।मण्डल कमीशन लागू करने की घोषणा के बाद भारतीय जनता पार्टी असहज स्थिति में आ खड़ी हुई और उसने आडवाणी जी के नेतृत्व में रामरथ का दौरा तेज कर दिया।वीपी सिंह जी की सरकार मण्डल कमीशन लागू करने के बाद पदच्युत हो गयी। 


आडवाणी जी का रामरथ कमण्डल लेकर मण्डल को निगलने हेतु निकल पड़ा था,पूरा देश मण्डल-कमण्डल में बंट गया था।चन्द्रशेखर जी प्रधानमंत्री बन गए थे।मण्डल कमीशन की लड़ाई सड़क से लेकर कोर्ट तक चल पड़ी थी।लालू प्रसाद यादव जी मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करते हुए उत्तर भारत में मण्डल कमीशन की लड़ाई के नायक के रूप में आगे आ गए थे।शरद जी को मण्डल रथ से उत्तर भारत में मंडल कमीशन के पक्ष में जमीन तैयार करने के लिए मधेपुरा से लालू जी ने झंडा दिखाके रवाना किया था।लालू जी ने जगह-जगह मण्डल कमीशन के पक्ष में रैलियां की।वर्षो तक मण्डल की लड़ाई को अंजाम तक पंहुचाने के लिए लालू जी सड़क,सदन और सर्बोच्च न्यायालय में लड़ते रहे।लालू जी ने बिहार,यूपी सहित देश के अनेक राज्यो में रैलियां की,पटना,लखनऊ,दिल्ली में सम्मेलन व रैलियां हुईं।जेलभरो आंदोलनों से लेकर प्रदर्शनों का लंबा दौर चला।लालू जी ने इंदिरा साहनी केस में मण्डल कमीशन की लड़ाई जीतने हेतु रामजेठमलानी जी को खुद द्वारा सुप्रीम कोर्ट में वकील रखा।लालू जी सुप्रीम कोर्ट में दायर मुकदमे की पैरवी अपने निजी केस की तरह देखते हुए पैरवी में लगे रहे।लालू जी के सद्प्रयासों,मेहनत,दृढ़ निश्चय से मण्डल कमीशन 7 अगस्त 1990 को लागू किये जाने की घोषणा के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा 16 नवम्बर 1992 को फैसला कर लागू करने की तरफ बढ़ सका।लालू जी ने रामजेठमलानी जी के आरगूमेंट से और तमाम साक्ष्यों को प्रस्तुत करवाके अपनी ऐंडी-चोटी लगा करके सुप्रीम कोर्ट से मण्डल के पक्ष में फैसला दिलवाने में महती भूमिका निभाई जिसकी बदौलत श्री एमएच कानिया जी के नेतृत्व की बहुसदस्यीय खंडपीठ ने कुछ विसंगतियों के साथ इस ऐतिहासिक मण्डल कमीशन को लागू करने का फैसला सुना दिया।

लालू जी मण्डल कमीशन को छूकर छोड़े नही बल्कि मण्डल कमीशन को उसके लागू होने तक पीछा करते रहे।लालू जी ने मुख्यमंत्री रहकर पद का उपभोग करने,अभिजात्य वर्गो का दुलारा बनने हेतु अपने वर्गीय हित को तिलांजलि देने का अन्य लोगो की तरह अपराध नही किया।लालू जी ने अलोकप्रियता भोगा, गालियां सुनी लेकिन मण्डल कमीशन के मुद्दे पर समझौता नही किया।बिहार के तमाम या यूं कहें प्रायः सभी पिछड़े-दलित नेताओं की तरह स्वहित में अभिजात्य वर्गो व इन अभिजात्य वर्गो की पार्टियों के समक्ष समर्पण करना लालू जी ने स्वीकार नही किया जिसका खामियाजा लालू जी सीबीआई उत्पीड़न,जेल जाने,चाराचोर कहलाने के रूप में भुगते है और भुगत रहे हैं।

सोचने की बात है कि कोई चैनल,मीडिया,सरकारी एजेंसियां,देश के अभिजात्य वर्ग की पार्टियां या हमारे समाज के कथित ईमानदार बुद्धिजीवी जगन्नाथ मिश्र जी को चाराचोर नही कहते जबकि चारा घोटाले का भंडाफोड़ करने वाले लालू जी चाराचोर के रूप में ख्यातिप्राप्त हैं।क्या हम सबने यह सोचा है कि लालू जी को डिस्क्रेडिट करने के लिए उनका मखौल क्यो उड़ाया जाता है?लालू जी ही देश की सीबीआई,मीडिया,राजनैतिक घरानों के टारगेट क्यो हैं?क्या इस देश मे लालू जी से बड़े-बड़े पूंजी खोर अन्य नेता नही हैं?कुछ वर्षों में 300 गुना सम्पत्ति बढ़ाने वाले नेताओं के वहां सीबीआई क्यो छापे नही डालती?मैं स्पष्ट तौर पर कह सकता हूँ कि लालू जी ने इस देश मे दो बड़े अपराध किये हैं जिसकी सजा उन्हें अभिजात्य वर्ग द्वारा मिलनी ही है।लालू जी ने पहला अपराध पिछडो की वकालत कर उन्हें मण्डल कमीशन दिलवाने व लागू करवाने का किया है और दूसरा अपराध आडवाणी जी की रथयात्रा रोक करके भाजपा को दशकों पूर्व दिल्ली की सत्ता में आने से रोकने का किया है।लालू जी ने सामाजिक न्याय एवं साम्प्रदायिक सद्भावना के एजेंडे को अपने जीवन का आदर्श बनाके इस देश के अभिजात्य समाज को नाराज करने का जो अपराध किया है उसकी सजा लालू एवं लालू के परिवार को भोगना ही है।

भारतीय धर्मशास्त्र गवाह हैं कि जिन गैर सवर्णो ने इस देश मे वंचितों की बात किया है वे कथित भगवानों मसलन विष्णु,इंद्र,नरसिंह,राम,बामन आदि के द्वारा मारे गए हैं।जिस किसी अनार्य राजा ने मनु के विधान के इतर आवाज उठाई या कार्य व्यवहार किया वे बलि,हिरणकश्यप,रावण,महिषासुर आदि के रूप में विद्रूप कर हत दिए गए और उनकी हत्या पर जश्न मनाया गया जैसे आज लालू जी को चाराचोर कह जश्न मनाया जा रहा है।
मेरे ख्याल से अभी गनीमत है कि दुनिया की निगाहें पड़ने,लोकतंत्र होने और अम्बेडकरी संविधान लागू रहने से लालू जी का वध नही किया गया है वरना यदि सामाजिक न्याय एवं धर्मनिरपेक्षता का झंडा बुलंद करने का कार्य लालू जी कुछ सौ वर्ष पूर्व किये होते तो वे भी इन कथित असुरों की श्रेणी में सूचीबद्ध कर उन्ही के हश्र को प्राप्त हो गए होते।

मैं निःसंकोच लालू जी को "7 अगस्त मण्डल दिवस" पर कह सकता हूँ कि मण्डल का हीरो "लालू" ही हैं।मैं इस मण्डल नायक को मण्डल दिवस पर सलाम करता हूँ और इनके दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ।

07/08/2017

श्री चंद्र भूषण सिंह यादव का सुझाव


साथियों------! 

यह लेख भले ही एक खुले खत के रूप में श्री अखिलेश यादव जी को लिखा गया हो पर श्री चंद्र भूषण सिंह यादव ने इसमें मंडल राजनीती और पिछड़े वर्ग (समूह) को एकजुट करने पर जो बल दिया है वह केवल अखिलेश जी  लिए नहीं बल्कि उन तमाम नेताओं के लिए है जो किसी भी तरह से भटक गए हैं। यदि यहाँ उन्हें इस पत्र को सम्बोधित कर दिया जाय तो बहुत कुछ उनके भी यही हाल है ? अभी हाल में ही बिहार के मुख्यमंत्री का खेल भी इसी नजरिये से देखा जा सकता है। 

लब्बो लुबाब भाई श्री चंद्र भूषण सिंह यादव ने जिस बेबाकी से अखिलेश जी को सुझाया है यदि वे वक़्त रहते इस मुद्दे को नहीं उठाते और पूरी जमात में शरीक नहीं होते तो अपना भविष्य वह तय कर चुके हुए मान लिए जाएंगे। 

हालांकि उनके अल्पकालीन और परिवार के दीर्घकालिक स्वाभाव को देखते हुए इसकी उम्मीद न के बराबर ही है क्योंकि उनके मन की अवधारणा में यह विषय तो कहीं दीखता नहीं है, अभी जो कुछ कह रहे हैं उसके लिए न तो उनकी निति में कुछ है और न ही नियति में। 
फिर भी ------!
श्री चंद्र भूषण सिंह यादव के इस आलेख को मैं इस अपेक्षा से यहां लगा रहा हूँ की उन्हें ख़ुशी होगी और यह ब्लॉग उनका आभारी रहेगा। 

(साभार : श्री चंद्र भूषण सिंह यादव की फेसबुक से लिया गया है)

सादर 
डॉ. लाल रत्नाकर 

"7 अगस्त मण्डल दिवस पर" 


"7 अगस्त मण्डल दिवस पर" 

श्री अखिलेश यादव जी के नाम खुली चिट्ठी-

"आरक्षण वंचितों का प्राण तो तीसरी धारा की राजनीति करने वाले दलों का मूलाधार है।"......



आदरणीय श्री अखिलेश यादव जी,

सादर 
जय भीम ! जय मण्डल !!
परमादरणीय श्री अखिलेश यादव जी! आरक्षण पर लम्बी प्रतीक्षा के बाद आपके इस बयान को पढ़कर कि "आबादी के आधार पर सभी जातियों को मिले आरक्षण",खुशी हुई कि चलो देर से ही सही समाजवादी पार्टी ने आरक्षण पर मुंह तो खोला।हमारे पुरखो ने आरक्षण के बाबत यही नारा लगाया है कि "जिसकी जितनी संख्या भारी,उसकी उतनी हिस्सेदारी" ,जिसे आपने बोलकर अभिनन्दनीय कार्य किया है।

मेरे जैसे असंख्य समाजवादियों को तब बड़ी निराशा हुई थी जब आपके नेतृत्व में गठित पिछ्डों की सरकार ने त्रिस्तरीय आरक्षण वापस लिया था,पदोन्नति में आरक्षण का डंके की चोट पर विरोध किया था,ठेको में दलितों के आरक्षण को खत्म किया था तथा मण्डल कमीशन को तिलांजलि दे आरक्षण विरोध की तरफ कदम बढ़ा दिया था।मुझे तब और भी घनघोर निराशा हुई थी जब आपने 2017 विधानसभा का चुनाव घोषणा पत्र जारी किया था।इस घोषणा पत्र में बहुसंख्य जन कल्याणकारी बातें लिखी थी पर आरक्षण एवं पिछड़ा वर्ग नदारद था।चुनाव का समय होने के कारण मैंने कलम तोड़कर सोशल मीडिया से लेकर सोशलिस्ट फैक्टर सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में आपके पक्ष में लिखा था क्योकि कुल के बावजूद उम्मीद भी आप या आप की तरह की जमातों से ही है इसलिए लाख कमियों के बावजूद उम्मीद की किरण जहाँ दिखती है,व्यक्ति वहीं रहता है।हमने भी तमाम विसंगतियों के बावजूद आपकी तरफ सदैव आशा भरी उम्मीद रखी है कि कभी तो आप अपने असली लाइन-लेंथ पर बालिंग/बैटिंग करेंगे?

अखिलेश जी!भारतीय राजनीति के संदर्भ में जाति और धर्म शाश्वत सत्य हैं।यह अमेरिका या ब्रिटेन नही है कि विकास,काम,योग्यता,अच्छाई, नेकी और सहृदयता पर वोट मिल जाएगा।यह भारत है जहां अच्छाई और काम का कोई मतलब नही,यहां जाति और धर्म की राजनीति प्रभावशाली है।हम जिस वेद,पुराण,महाभारत,रामायण,गीता,मनुस्मृति आदि को आदर्श मानते हैं वहां जाति, धर्म,लिंग आदि के आधार पर जबर्दश्त भेदभाव हुवा है और उसी के मुताविक इंतजाम का आदेश/निर्देश है।हमारे धर्मशास्त्र नीति की जो बात करते हैं वहां क्या है,यदि हम तार्किक दृष्टि से विवेचना करेंगे तो पाएंगे कि इन नीति निर्देशो में केवल और केवल अनीति ही भरी पड़ी है।राजसत्ता के लिए कैसे-कैसे पाप नही किये गए हैं?छल से एकलब्य का अंगूठा काटना,निर्दोष शम्बूक का वध करना, सत्यवादी युधिष्टिर से "नरो वा कुंजरो" कहलवाक़े मरने को विवश करना,सूर्य को ढककर शाम का मंजर बनाके जयद्रथ को मरवाना,शिखंडी का प्रयोग करके भीष्म को साधना,गर्भवती सीता को जंगल छोड़ना,अकेली और निर्दोष सूर्पनखा का नाक-कान काटना आदि अन्यान्य दृष्टांत केवल और केवल यही दर्शाते हैं कि जाति, लिंग,वर्ण आदि के आधार पर अन्याय करके ही यहां राजसत्ता पर काबिज हुवा जाता रहा है।

अखिलेश यादव जी! भारतीय सन्दर्भ में आप आस्ट्रेलिया,जर्मनी,अमेरिका या जहां आप अक्सर जन्मदिन मनाने जाते हैं ब्रिटेन का मापदंड अपनाएंगे तो सफलता क्या असफलता के आखिरी पायदान पर रहना पड़ेगा।बहुत सोच-समझ के समाजवादी पुरखो ने जो सभी के सभी बड़ी जातियों के थे मसलन लोहिया,जयप्रकाश,नरेन्द्रदेव,एस एम जोशी,मधु लिमये,मधु दण्डवते,राजनारायण,अच्युत पटवर्धन आदि ने "सोशलिस्टों ने बांधी गांठ,पिछड़े पावें सौ में साठ" का नारा लगाया था।वे सभी के सभी बड़ी जाति के समाजवादी लोग यूं ही नही यह नारा दिए थे,इस नारे को देने के पीछे बहुत बड़ा सामाजिक,राजनैतिक कारण था।वे जानते थे कि नेहरू को गांधी का वरदान प्राप्त है ऐसे में इस देश के वंचितों की बात करके ही हम खड़े हो सकते हैं तो समाजवाद का यही तकाजा भी है कि उस विपुल आबादी को सामाजिक आजादी मिले जिसे हजार वर्ष से सामाजिक,राजनैतिक,सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से जाति और धर्म के आवरण में बांध करके दास या गुलाम बना के रखा गया है।

अखिलेश जी! इन सवर्ण समाजवादी पुरखों के पिछड़ा परस्ती के पीछे दो बातें थीं,पहला इन वंचित तबकों को हजारो वर्ष बाद न्याय मिले तो दूसरा इन सत्ता से वंचित समाजवादियों को मजबूत आधार।भारतीय राजनीति में पिछड़ा वर्ग और समाजवादी पार्टी एक दूसरे के पूरक बने और लम्बे समय से समाजवादी धारा और पिछड़ा वर्ग साथ-साथ रहे जिसकी परिणति 7 अगस्त 1990 को मण्डल कमीशन की घोषणा के रूप में सामने है।

अखिलेश जी! मुलायम सिंह यादव जी,शरद यादव जी,चन्द्रजीत यादव जी,लालू प्रसाद यादव जी,रामविलास पासवान जी आदि नेताओ को जब पत्र लिखा जाता रहा है तो वे लोग उसे पढ़ते और फिर जबाब देते रहे हैं पर मैंने तमाम अवसरों पर बिन मांगे आपको राय देने की हिमाकत करते हुए फोकट का रायदाता बनने का कार्य किया है लेकिन मुझे लगता है कि आपने मेरे पत्रों या सुझावों को इस लायक नही समझा कि उसे फॉलो किया जाय या उनका क्रियान्वयन किया जाय।आप शायद उन्हें पढ़ने की जहमत ही नही उठाये होंगे वरना निश्चय ही वे क्रियान्वित हुए होते तथा जबाब आया होता।खैर मेरे जैसे लोग विचारधारा के स्तर पर थेथर कहे जाएंगे क्योकि इतने के बावजूद हम फिर लिख रहे हैं परंतु तरीका बदल गया है।इस बार हम सोशल मीडिया पर आपके नाम खुला पत्र डाल रहे है क्योकि हमे उम्मीद है कि सोशल मीडिया पर लिखे गए मेरे खुले पत्र पर और भी कुछ नए विचार या संशोधन आ पाएंगे जो समाजवादी या पिछड़ा वादी राजनीति के लिए मील का पत्थर साबित होगे।


अखिलेश जी! मुझे इस बात का इल्म है कि आप ऑस्ट्रेलिया में पढ़े,डिम्पल जी से जातितोड़ शादी किये,मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव जी के बेटे के रूप में सामाजिक मान्यता पाए तथा होश संभालते ही जय-जयकार के नारों के साथ मुख्यमंत्री बन गए इसलिए जाति और धर्म के जमीनी हकीकत से रूबरू नही हुए अस्तु आपको अपने काम पर वोट मांगने में विश्वास रहा।मैं आपको बहुत दोष नही दूंगा कि आपने जाति,धर्म,बाहुबल आदि का प्रयोग क्यो नही किया?आप तिकड़म,इन विविध किस्म के जाल-बट्टों से इतर स्वच्छ और पारदर्शी राजनीति करने के हिमायती बनकर यूपी में पांव जमाना चाहते थे लेकिन यह जो हजार वर्ष की सामाजिक विद्रूप राजनीति है वह आपके मंसूबो को धराशायी कर दी,जिसे शायद अब आप महसूस कर रहे हैं।
अखिलेश जी! देखिये न आप कह रहे हैं कि "जिसके हर जाति में दो-चार मित्र नही वह समाजवादी नही",आप कह रहे हैं कि "काशी नही बना क्योटो,बुलेट ट्रेन का पता नही" और अमित शाह जी कह रहे हैं कि "यादव-जाटव जोड़ो।"अमित शाह यह समझ गए हैं कि जातियों की राजनीति किये बगौर भारत मे सत्ता हासिल नही की जा सकती है इसी नाते भाजपा ने पहले गैर यादव पिछडो औऱ गैर जाटव दलितों को साधा जबकि अब वे पिछडो की बिपुल आबादी यादव एवं दलितों की बिपुल आबादी जाटव को साधने की फिराक में हैं। दलित मतों को साधने हेतु भाजपा ने रामदास अठावले,उदित राज एवं रामविलास पासवान आदि को पहले ही अपने खेमे ले ले चुकी है जबकि अब वह जाटव को अपनाने की युगत में है इसी तरह उसका पाशा यादव पर फेंका जाने वाला है जिसके तहत सोनू यादव के घर सहभोज किया जा चुका है।अखिलेश जी!जाति की ताकत देखिये कि देश के प्रधानमंत्री मोदी जी गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए "घांची" जाति जो मारवाड़ी की उप जाति थी,को पिछड़ी जाति में अध्यादेश ला शामिल कर खुद की कलम से खुद ही पिछड़ी जाति में शामिल हो गए।प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनने के बाद खुद को नीच जाति बता करके वे वंचितों की विपुल आबादी में यह संदेश दे बैठे कि मोदी इस देश का एक नीच पिछड़ा है जो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर इन छोटी जातियों का स्वाभिमान बढ़ाएगा जबकि आप और आपके पिताजी श्री मुलायम सिंह यादव जी सवर्ण परस्त बनने के लिए सन्सद में पदोन्नति आरक्षण बिल फाड़ रहे थे तो सभाओं में इसके बिरुद्ध ललकार रहे थे। अखिलेश जी!सोचिए कि आपका पाशा कैसे उल्टा पड़ा कि सवर्ण आपके पाले में आया नही और पिछड़े को आपका नारा व कार्य भाया नही जबकि दलित को आपका आचरण सुहाया नही और आप लोकसभा में 5 तो विधानसभा में 47 पर अटक गए जबकि मोदी पिछड़े की बात कर आपको गटक गए।

अखिलेश जी! मैंने जय भीम कहा है वह इस नाते कि आप मुख्यमंत्री बने,नेताजी श्री मुलायम सिंह यादव जी व मायावती जी मुख्यमंत्री बनी या इस देश मे वंचित समाज का कोई व्यक्ति कुछ भी बना तो उसमें भीम राव अम्बेडकर जी का बहुत बड़ा योगदान है।सोचिए कि अम्बेडकर साहब ने कितने तिरस्कार के बाद हम सबको सत्ता,सम्पत्ति,सम्मान,शिक्षा,आरक्षण आदि का अधिकार भारतीय संविधान में दिलवाया है।अम्बेडकर साहब द्वारा संविधान के अनुच्छेद 340,341,342,16(4),15(4) आदि में हमे जो संवैधानिक अधिकार दिए गए हैं उन्ही की बदौलत मनु का आचार-व्यवहार सुसुप्त हुवा है और हम सम्मान की जिंदगी जी पा रहे हैं। हमने जय मण्डल भी कहा है जो पिछडो के लिए आज सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष श्री विंदेश्वरी प्रसाद मण्डल जी ने 1 जनवरी 1979 को मण्डल आयोग गठित होने के बाद दो वर्ष अनवरत कार्य करने के उपरांत 31 दिसम्बर 1980 को अपनी रिपोर्ट प्रेषित करने के बाद सिफारिश किया कि पिछडो को 27 प्रतिशत सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाय,पदोन्नति में आरक्षण को ग्राह्य बनाया जाय,न भरे गए पदों को 3 वर्ष तक आरक्षित रखा जाय,sc/st वर्ग की तरह पिछडो को आयु सीमा में छूट दी जाय,पदों के प्रत्येक वर्ग के लिए sc/st की तरह रोस्टर प्रणाली अपनायी जाय,राष्ट्रीयकृत बैंकों,केंद्र व राज्य सरकार के अधीन सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमो में आरक्षण दिया जाय,वित्तीय सहायता प्राप्त निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में आरक्षण लागू किया जाय,सभी कॉलेजों/विश्वविद्यालयो में आरक्षण प्रभावी बनाया जाय,पिछड़े वर्ग के छात्रों को ट्यूशन फ़ी फ्री किया जाय,किताब,वस्त्र,दोपहर का भोजन,छात्रावास,वजीफा एवं अन्य शैक्षणिक रियायते दी जाय,सभी वैज्ञानिक,तकनीकी एवं व्यवसायिक संस्थानों में पिछडो को आरक्षण दिया जाय,तकनीकी व व्यवसायिक संस्थानों में विशेष कोचिंग का इंतजाम किया जाय,लघु उद्योग लगाने हेतु पिछडो को समुचित वित्तीय व तकनीकी सहायता दी जाय,बंजर/ऊसर/बेकार भूमि का एक हिस्सा पिछडो को दिया जाय,पिछड़ा वर्ग विकास निगम बनाया जाय,राज्य व केंद्र स्तर पर पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्रालय गठित किया जाय एवं केंद्र सरकार द्वारा पिछडो को समुचित धन देकर मदद किया जाय।

अखिलेश जी! अम्बेडकर साहब द्वारा रचित संविधान में अनुच्छेद 340,341,342,15(4),16(4) आदि की बदौलत sc/st/obc आज आरक्षण पाकर उन्नति की सीढ़ियां चढ़ रहा है तो मण्डल साहब की सिफारिशों की बदौलत पिछड़ा देर से ही सही चपरासी से लेकर कलक्टर तक बन रहा है,ऐसे में ये हमारे समाज और हमारी पार्टियों के लिए आदर्श हैं।अखिलेश जी!देश का सँविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ लेकिन पिछडो को उनका संवैधानिक अधिकार मण्डल कमीशन 7 अगस्त 1990 को घोषित हुवा,13 अगस्त 1990 को अधिसूचित हुवा तो कोर्ट द्वारा क्रीमी लेयर के साथ 16 नवम्बर 1992 को लागू हुआ।अखिलेश जी! देश की 52 प्रतिशत आबादी जो पिछड़ा वर्ग मानी गयी है उसमें 43 प्रतिशत हिन्दू आबादी तो 9 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है।हिंदुओ में ब्राह्मण,क्षत्रिय,मारवाड़ी,कायस्थ,भूमिहार व sc/st को छोड़कर सभी पिछड़े कहे गए तो मुस्लिम में शेख,सैयद,पठान को छोड़कर सभी पिछड़े माने गए हैं।इन पिछड़े हिन्दू व मुसलमानों को जिनकी आबादी मण्डल साहब ने 52 प्रतिशत मानी 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश किया।

अखिलेश जी! देश के संविधान के अनुसार प्राप्त अधिकार के तहत पिछडो को आरक्षण के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े हैं।सवर्ण लोगो ने देश के रेल,बस को फूंक कर इस सांवैधानिक प्राविधान को रोकने का भरपूर प्रयास किया है जिसमे गाहे-बगाहे आप भी 2012 से 2017 के अपने सरकार में शामिल रहे हैं।मायावती जी ने भी पिछडो के त्रिस्तरीय आरक्षण का विरोध कर अपने सर्वजनवादी मुखौटे को सामने लाकर आरक्षण की अवधारणा को धूल धूसरित किया है।अखिलेश जी!आपने पदोन्नति में आरक्षण का प्रत्यक्ष विरोध करके जहाँ आरक्षण को कमजोर बनाया और खुद भी कमजोर हुए हैं तो वहीं मायावती जी ने सत्ता में रहते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार वंचित तबकों के समुचित भागीदारी की गणना कराने की बजाय सतीश चंद्र मिश्र जी को खुश करने व अपने सर्वजनवादी स्वभाव को एक्सपोज करने के लिए पुनः सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल कर पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था को निष्प्रभावी बनाने का अपराध किया है।

अखिलेश जी! आप और मायावती जी सवर्ण तुष्टिकरण में इतने तल्लीन हो गए कि आपलोगो का मूल आधार ही खिसक गया।जिस आधार को बनाने में लोहिया से लेकर रामसेवक यादव,कर्पूरी ठाकुर,रामनरेश यादव,वीपी सिंह ने अनगिनत गालियां सुनी,कांशीराम साहब ने फजीहत झेली और आप को एवं मायावती जी को एक ठोस आधार दिया उसे आप दोनों लोगों ने सर्वजनवादी नीति अपनाके खुद ही दरका डाला है।अब आप लोगो को खुद की नीति में सुधार व प्रायश्चित करना है वरना न आप लोगो का अस्तित्व बचेगा और न बहुजन वाद/समाजवाद जीवित रह पाएगा।

अखिलेश जी!आपने यूपी के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी का बयान जरूर पढा होगा जिसमें उन्होंने कहा है कि "अब समाजवाद नही,राष्ट्रवाद की जरूरत है।"भाजपा का मनुवादी स्वरूप अब धीरे-धीरे सामने आता जा रहा है।वे अब राष्ट्रवाद मतलब मनुवाद पर खुलकर बोलने लगे हैं।स्पष्ट है कि वे बोलें भी क्यों नही,क्योकि अब उनका प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति,राज्यसभा,लोकसभा,देश की सूबाई सरकारों में बहुमत जो हो गया है।अब तो उन्हें अपने एजेंडे को लागू करने में कोई कठिनाई नही दिख रही है क्योंकि विपक्ष अत्यंत कमजोर व दिशाहीन स्थिति में लकवा ग्रस्त खड़ा है।

अखिलेश जी!आपने भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी जी का भी बयान पढ़ लिया होगा जिसमे उन्होंने कहा है कि "भाजपा आरक्षण को वहां पंहुचा देगी जहां आरक्षण का होना और न होना बराबर होगा।"अखिलेश जी!यह वक्त अत्यंत सोचनीय है।देश अजीब तरह की खाई में जा रहा है जिसे हमलोग खुद खोदे हुए हैं।इस स्थिति से देश व वंचित समाज को बचाना होगा जिसके लिए आपको अब खुलकर सामने आना होगा।
अखिलेश जी! आपका आबादी के अनुपात में आरक्षण देने की मांग वाला यह बयान बुझ रहे सामाजिक न्याय के दीपक में तेल डालकर जलाने के प्रयास वाला बयान है जिसे सुनकर हमारे जैसे तमाम लोगों को खुशी हुई है लेकिन इसे मैं नाकाफी मानता हूं।

अखिलेश जी!आरक्षण पर अब आरपार के जंग की जरूरत है।यदि आप चूक गए तो दुनिया की कोई ताकत नही है जो यूपी के यादवो को भाजपाई होने से रोक दे क्योकि आप देख ही रहे हैं कि कितने बड़े-बड़े सेक्युलर लोग और यादव भाजपा के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को वोट कर गए है?कैसे भाजपा सरकार की यादव नेतृत्व द्वारा आपको नीचा दिखाने के लिए तारीफ की जा रही है?भाजपा कैसे यादवो को जोड़ने की कवायद शुरू कर दी है।बिहार में लालू जी और युवा तेजश्वी यादव जी के कारण यादवो का भाजपाईकरण नही हो पा रहा है लेकिन यूपी उनके टारगेट पर है क्योकि यहां अब तक उन्हें सामाजिक न्याय का एजेंडा सपा-बसपा द्वारा अपनाया जाता हुवा दिख नही रहा है।

अखिलेश जी! मुझे अंदेशा है कि भाजपा यूपी के यादवो को साधने के लिए भूपेंद्र यादव जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना सकती है तो संविधान संशोधन कर अहीर रेजिमेंट का निर्माण भी कर सकती है।भाजपा ऐसा कर एक तीर से दो निशाने कर डालेगी।एक यूपी के यादव नेतृत्व को हड़प लेगी तो दूसरे अहीर रेजिमेंट बना मण्डल को निगल जाएगी।अखिलेश यादव जी!सतर्कता जरूरी है।आप मण्डल कमीशन पूर्ण रूप से लागू करने की मुहिम शुरू करें।आपने आबादी के अनुपात में आरक्षण की जो बात की है उसके लिए जातिवार जनगड़ना की जरूरत पड़ेगी इसलिए समाजवादी पार्टी को दूसरे सारे एजेंडों को छोड़ करके सीधे-सीधे सामाजिक न्याय के एजेंडे को अख्तियार करना चाहिए।समाजवादी पार्टी को जातिवार जन गड़ना कराने, आबादी के अनुपात में आरक्षण देने,प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण को प्रभावी बनाने,न्यायपालिका में आरक्षण को लागू करने,मण्डल कमीशन की समस्त संस्तुतियों को लागू करने का अभियान छेड़ना चाहिए।

अखिलेश जी!वक्त बहुत नाजुक दौर से गुजर रहा है। फासिस्ट ताकतें फन फैलाने लगी हैं,फैलाएं भी क्यो नही,उनकी एक छत्र सत्ता जो कायम हो गयी है। राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री,उपराष्ट्रपति,देश के बहुसंख्य राज्यो में सरकारे भाजपा की हो चली हैं।अब वक्त भाजपा के पाले में है। वे संविधान बदलें,आरक्षण खत्म करें,मनु विधान लागूं करें,उनकी मर्जी क्योकि विपक्ष सुस्त और दिशाहीन हो चुका है। अखिलेश जी! भाजपा और उसके हिंदुत्व का एक मात्र काट मण्डल,आरक्षण,भागीदारी है।

अखिलेश यादव जी!हो सकता है कि आपको मेरी बात बुरी लगे लेकिन मैं आपका शुभेच्छु हूँ। कुछ लोग हैं जो आपके चेहरे पर लगे दाग को यह कहकर सराह सकते हैं कि "दाग है तो क्या अच्छा है" लेकिन मैं आपके समक्ष पूर्व में भी आईना रखता रहा हूँ और अब भी रखूंगा क्योकि मुझे आपसे और अपने वर्गीय हित से स्नेह और लगाव है।

अखिलेश जी! मैं आपका कोई प्रतिद्वंदी नही हूँ,मैं आपका एक छोटा सा कार्यकर्ता हूँ लेकिन मुझे अपने समाज और वंचित तबके की फिक्र है,समाजवादी पुरखो की ललकार का इल्म है और मुद्दों का ज्ञान है इसलिए मैं आपको आगाह करूँगा क्योकि यह समय बहुत नाजुक है,चूक गए तो खत्म होने की शुरुवात हो जाएगी।

अखिलेश जी! पुल, सड़क,मेट्रो,रिवर फ्रंट,एक्सप्रेस वे जरूरी हैं लेकिन इनसे जरूरी वंचित तबकों की तरक्की है।इस देश के पिछ्डों,अल्पसंख्यको व दलितों के शिक्षा,सम्मान,सुरक्षा,रोजगार की आवश्यकता सबसे महत्वपूर्ण है।इन सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से वंचित तबकों की कीमत पर मेट्रो,रिवर फ्रंट,एक्सप्रेस वे का कोई मोल नही है।यदि ये तरक्की किये तो आप,आपकी पार्टी,प्रदेश एवं देश तरक्की करेगा इसलिए अखिलेश जी आरक्षण,संविधान,भागीदारी,पिछड़ापरस्ती,दलित हित, अल्पसंख्यक सुरक्षा समाजवादियों का एजेंडा था और रहना चाहिए,यदि आप इससे विरत हुए तो भाजपा का हिंदुत्व,छद्म राष्ट्रवाद और मनुवाद मजबूत हो जाएगा।

अखिलेश जी! मैं इस उम्मीद के साथ 7 अगस्त की क्रांतिकारी बेला में अनुरोध करता हूँ कि मण्डल कमीशन पूर्णतः लागू करने का अभियान शुरू करना चाहिए।वीपी मण्डल की जयंती,पुण्य तिथि मनायी जानी चाहिए,समस्त पिछड़े /दलित महापुरुषों के चिंतन को आत्मसात करना चाहिए,निर्भय होकर पिछडो की बात उठानी चाहिये क्योकि यही आपकी मूल पूंजी हैं,जब आपकी मूल पूंजी मजबूत रहेगी तो ब्याज तो वैसे ही मिलता रहेगा इसलिए ब्याज के चक्कर मे अपनी मूल पूंजी गंवाने की गलती दुहराने की बजाय आप मजबूती से सामाजिक न्याय की अवधारणा को बलवती बनाएंगे यही उम्मीद है।
क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,
सादर,
भवदीय

चन्द्रभूषण सिंह यादव

09/05/2017

लालू प्रसाद यादव को फसाने के मायने !

लालू प्रसाद यादव को फसाने के मायने !
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भारतीय राजनीति में जो भी हो लालू प्रसाद को कितना सीरियस लिया जाता है यह एक अलग बात है। लेकिन कुछ लोग बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि लालू प्रसाद यादव को सुना जाता है और उन्हें सुनने वाले लोग देश में बड़ी संख्या में आज भी उपस्थित हैं जिनमें दलित पिछड़े और अल्पसंख्यक मुख्य रूप से हैं कुछ सवर्णों को भी लालू प्रसाद यादव अच्छे लगते हैं जिन्हे सच से दुराव नहीं है। क्योंकि लालू प्रसाद यादव का दिमाग बिल्कुल साफ है कि वह स्पष्ट तौर पर समझते हैं कि किसकी कितनी भागीदारी राजनीति में होनी चाहिए बिहार जैसे प्रदेश में, उसी तरह देश में भी। जो लालू प्रसाद यादव को जानते हैं वह या उनके जैसा व्यक्ति था जिसने वहां के भूमिहारों को धराशाई किया ? और राजनैतिक रूप से वह उन्हें बताया की उनकी जगह क्या है। फिर उसी की भरपाई करने के लिए देश भर का सामंतवादी सोच का वह वर्ग हर तरफ से उनको फसाने का सफल प्रयास कर रहा है।

एक तरह से देखा जाय तो वैधानिक रुप से फंसा ही लिया है, लेकिन इस फसाने को हमें दूसरे तरह से भी देखना चाहिए कि जब अंग्रेजों का राज्य था तो वह हर उस आदमी को अपराधी बना देते थे जो उनका विरोध करता था। आज की तारीख में लालू प्रसाद यादव जैसा व्यक्ति समग्र रूप से उनका विरोध करता है और उनके विरोध को आम आदमी समझता भी है। अब यह आम आदमी की जिम्मेदारी बनती है कि लालू प्रसाद यादव के लिए न्याय की मांग सड़क पर उतर कर करें और सामाजिक न्याय के मसीहा को इतना समर्थन दें जिससे वह देश की असली आजादी को आम जन तक पहुंचाने में कामयाब हो सके।
यही अवसर है जब हम बगावत कर सकते हैं संस्था से जो इस तरह का षडयंत्र कर रहे हैं ? क्योंकि ऐसे कितने राजनीतिज्ञ, व्यापारी, उद्योगपति, अफसर या धार्मिकनेता लोग इस देश में हैं जो दूध के धुले हुए हैं और बिल्कुल साफ सुथरे हैं ? यह आवाज बुलंद होनी चाहिए सबसे पहले उसे पकड़ा जाए जिसकी वजह से देश में आज तक बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का लिखा हुआ कानून / संविधान ठीक से लागू नहीं हो सका और अगर ठीक से लागू हुआ होता तो आज इस तरह से लोगों को जातियों को नाम पर फसाया न जाता। क्योंकि जगन्नाथ मिश्रा जाती विशेष के नाते कहीं नज़र नहीं आ रहे हैं ? जबकि सारा जहर उनका है जिसका असर लालू प्रसाद पर हो रहा है। उधर जाति विशेष के आधार पर न्यायाधीश को न्यायाधीश द्वारा ही जलील किया जा रहा है और उसे जेल किया जा रहा है जो भारत के इतिहास का पहला मामला है।
ऐसे में सामाजिक न्याय की बात करने वाले सामाजिक न्याय के चिंतकों को भक्तों को सड़क पर आना चाहिए और कानून एक जैसा हो ! संविधान एक जैसा सबके लिए है। इसपर आंदोलन खड़ा करना चाहिए और राजनीतिक रूप से फसाया जा रहे व्यक्तियों को हमें ताकत देना चाहिए जिससे वह सामाजिक न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ा सकें।
मुझे तो यही लगता है की यदि लालू प्रसाद पांडेय होते तो ऐसा न होता ?
डॉ. लाल रत्नाकर 

पराजय भी हमारे लिए एक पाठ ही होती है

डॉ. लाल रत्नाकर 

कई बार हम परास्त हो जाते हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे हम खत्म हो गए हैं जबकि ऐसा होता नहीं हमारी पराजय भी हमारे लिए एक पाठ ही होती है यह भी हमारे अंदर कहीं ना कहीं कोई ना कोई ऐसी कमी है जो लोगों को पसंद नहीं आ रही है इस बीच में जब अपने पुराने क्षेत्र में घूम रहा था तो कुछ ऐसी जानकारियां और बातचीत में लगा की राजनीति को लोग अपने अधिकार और अपनी संपत्ति समझने लगे हैं ।

जबकि ऐसा नहीं है लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने कहने और यहां तक की उस पर चलने की बड़ी जरूरत होती है। यदि हम राजनीति में प्रतिनिधित्व करने के लिए पद के रूप में कोई भी पद हासिल करने का जो भी जुगाड़ करेंगे देर सवेर जनता उसे समझ जाएगी और उसे एहसास होगा कि हमने अपना प्रतिनिधि चुना है। या एक ऐसे महत्वाकांक्षी व्यक्ति चुना है जो हमें अपना गुलाम समझता है। जबकि लोकतंत्र में गुलामी नहीं होती लोकतंत्र बहुत ही मर्यादित तरीके से समाज के लिए काम करने का वह क्षेत्र है जहाँ त्याग और उदारता का बहुत महत्त्व है, जरुरत है। जबकि आज बहुत सारे लोग अति महत्वाकांक्षा में यह जानते हुए अति उत्साहित है कि वह जीत गए हैं और सदा के लिए जीत गए हैंजबकि ऐसा नहीं है।

जनता सब कुछ देख रही है मैं कल जिस कार्यक्रम में था वहां पर एक ऐसे व्यक्ति से मुलाकात हुई जो अभी 15 वी सदी में जिंदा है। जबकि उस कार्यक्रम में पाखंड के खिलाफ कुछ नए तरह के प्रयोग जिन्हें सामाजिक न्याय के पुरोधाओं ने शुरु किया है पर आयोजन था लेकिन किसी पक्ष का संबंधी होने के नाते जिस तरह से वह परब्रम्ह महामानव ईश्वर और पाखंड को ले करके उत्तेजित था उससे लग तो नहीं रहा था कि वह अपढ़ होगा लेकिन यह भी नहीं लग रहा था कि वह सही पढा भी होगा यदि इसी तरह के लोग समाज में नए परिवर्तनों का विरोध करते रहे तो वैसे ही जल्दी कोई इन परिवर्तनों के लिए तैयार भी नहीं होगा। ऐसे लोगों के आने से यह सारा आंदोलन कहीं बिखरता नजर आता है। जिसे संभालने की जरूरत है।

दूसरी ओर एक ऐसे राजनेता से भी मुलाकात हुई जो बहुत कम मतों से इस बार परास्त हुए हैं उनका दर्द अलग तरह का हैं, उनकी पीड़ा अलग तरह की है, उनके शत्रु अलग तरह के हैं उनके मित्र अलग तरह के हैं, लेकिन सब कुछ मिला करके यह लगा कि राजनीति में उनकी अप्रोच केवल और केवल अवसरवादी तात्कालिक सफलता की पराकाष्ठा को समझ पाई है ।


राजनीति हमेशा पराजय से बड़ी होती है यदि पार्टियों की बात करें तो सदियों से भाजपा हार रही थी और हारते-हारते आज वह देश में जीत गई है जो लोग वहां बने हुए हैं उनके दीर्घजीवी कार्यक्रम हैं। यही नहीं अन्यत्र लोग जीतते हारते हैं यहाँ विचार है जो जीते हैं ? अन्यत्र तो राजा हो गए और राजा होकर जो मर गए और वह नहीं हुए ? यदि वे सजग हुए होते तो सजग को वो जैसे ठगते रहे लूटते रहे उनकी वजह से जो आज सरोकारों से संपन्न समाज और आज वह पूरा जग ठगा गया है। 

आज जो हमारा नेता है वह समझता है कि वह लोगों को जल्दी से जल्दी ठग ले और वह जनप्रतिनिधि हो जाए और उसके जनप्रतिनिधि हो जाने से समाज के सारे संकट ख़त्म हो जाएंगे ? क्या खत्म हो जाएंगे अब तक जितने लोग इस तरह से जन प्रतिनिधि हुए हैं उन्होंने कितना समाज को बदल पाया है यह वह कितना समाज को बदलने का प्रयास कर रहे हैं यह सब देखते हुए राजनीति केवल सफलता की जगह नहीं है राजनीतिक परिवर्तन की जगह है और अगर परिवर्तन सामाजिक लेवल पर होगा तो जीत भी दूरगामी होगी और समाज बदलेगा तो राज भी बदलेगा अगर इनसे कोई पूछें पिछले दिनों जो लोग अपने को बदल करके यह बता रहे थे कि वह बहुत विकास कर गए हैं तो जनता ने उन्हें बता दिया यह विकास आपने अपना किया होगा जनता का कोई विकास नहीं किया है तो हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हम राजनीति कर किस लिए रहे हैं अपने विकास के लिए या लोकतंत्र में अपनी आवाज बुलंद करने के लिए जनता की विकास की। यद्यपि लालू प्रसाद जैसे लोगों को फ़साने का जो प्रयास है उसके पीछे उनकी राजनितिक समझ तो है पर मुलायम सिंह ने क्या किया ?

04/04/2017

भाग -17-
ध्यान से देखिये l
यह पूर्व मुख्यमंत्री माननीय अखिलेश यादव की पाँच साल की महान 'आरक्षण विरोधी' उपलब्धियां हैं l

भाग-18-
'आरक्षण' और 'सामाजिक न्याय' विरोधी पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 2013 से 2017 तक आरक्षण समर्थकों पर लाठियाँ बरसाया l उसका एक क्रूरतम और हिंसक दृश्य देखिये l किस तरह अखिलेश सरकार ने त्रिस्तरीय आरक्षण समर्थकों को इलाहाबाद से लखनऊ तक लगातार 3 साल लाठी चार्ज करके पिटवाया l जो पिछड़े,दलित और मुसलमान अखिलेश की लाठियाँ खाये, उनकी पीड़ा आप एक बार जरूर सुनिये l

https://www.youtube.com/watch?v=pi4bNTNnc4U

भाग -19-
माननीय अखिलेश यादव ने 'यश भारती पुरस्कारों' (2012 से 2016 तक) के वितरण में भयानक 'सामाजिक अन्याय' किया l ..... आईये देखिये ....
नेता जी ने कलाकारों, साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों, खेल, सिनेमा, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग आदि के लिए 'यश भारती' पुरस्कार 1994 में शुरू किया था l इस पुरस्कार प्राप्तकर्ता को सम्मानित होते समय 11 लाख रुपये दिए जाते हैं l उसके बाद आजीवन 50,000 रुपए पेंसन के रूप में मिलता है l 2012 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही एक तरफ से सवर्णों को पुरस्कार बांटना शुरू हुआ l l 2012 से लेकर 2016 तक इन्होंने जो यश भारती पुरस्कार बाँटे हैं l उसका आधार इन्होंने बनाया 60 से 65% तक ब्राह्मणों, 20 से 25% क्षत्रियों, भूमिहारों, कायस्तों और अन्य सवर्ण जातियों को दिया जाय l इसके बाद यदि कुछ पुरस्कार बँचता है तो OBC के लोगों को दिया जाय l अर्थात् 10% पुरस्कार में 60% OBC जनसंख्या को सिमटा दिया जाय l और बची हुयी 25% SC, ST को एक भी पुरकार न दिया जाय l इन्होंने ऐसा ही किया l आपने पांच साल के कार्यकाल में एक भी SC, ST को 'यश भारती' नहीं दिया l अखिलेश यादव जैसा सामजिक अन्याय तो कोई सवर्ण मुख्यमंत्री भी नहीं करेगा जितने खतरनाख तरीके इन्होंने से ऐसा कार्य किया l 2016 की यश भारती पुरस्कार प्राप्त कर्ताओं की लिस्ट निचे अटैच है l देखिये l 2016 में अखिलेश यादव ने 41 ब्राह्मणों को यश भरती पुरस्कार दिए l और कुछ पुरस्कार अन्य सवर्णों को l बाकि रत्ति भर पुरस्कार OBC को दिए जाय l SC,ST को एक भी पुरस्कार नहीं दिया गया l यह अखिलेश यादव का सवर्णपरस्त मन है l आप सोचिये कि मूल चेतना 85% प्रतिभावान मनुष्यों में से एक भी इन्हें प्रतिभावान व्यक्ति नहीं मिला l निम्नलिखित लोगों को भी अखिलेश यादव पुरस्कार दे सकते थे -- 
1 - फूलन देवी (अति सम्मान में मरणोंपरान्त )
2 - प्रोफेसर लाल रत्नाकर 
3 - डॉ. ओम शंकर 
4 - सबाना आज़मी 
5 - वीरेंद्र यादव
6 - प्रोफेसर दिनेश कुशवाह 
7 - प्रोफेसर सुभाष कुशवाह 
8 - प्रोफेसर चौथीराम यादव 
9 - उर्मिलेश उर्मिल 
10 - आलम बादी
11 - असि. प्रोफेसर अजय गोंड़
12 - फ्रैंक हुज़ूर
13 - ओमप्रकाश वाल्मीकि 
14 - माखान सिंह 
15 - जय प्रकाश कर्दम
16 - तुलसी राम 
17 - प्रोफेसर उमाकांत यादव 
18 - श्यौराज सिंह बेचैन 
19 - शांति यादव 
10 - डॉ अजय प्रजापति 
21 - डॉ सुरेश सिंह
22 - राम शंकर यादव विद्रोही 
23 - संतोष वाल्मीकि
24 - सोबरन कबीर 
25 - शयीदुर्र रहमान
26 - अकील अहमद 
27 - कृष्ण मोहन 
28 - नरसिंह यादव 
28 - प्यारे लाल यादव
30 - एच. एल. दूशाद 
31 - खेशारी लाल यादव 
32 - शमीम अंसदि 
33 - डॉ. जगदीश यादव 
34 - चंद्रभूषण सिंह यादव
35 - प्रोफेसर कालीचरण स्नेह 
36 - कँवल भारती 
37 - डॉ. विवेक कुमार 
38 - चंद्रभान प्रसाद 
39 - उमेश यादव 
40 - कुलदीप यादव 
आदि l आप सब और नाम जोड़ सकते हैं l
फोटो-- Fark India patrika se sabhar
भाग -20-
अखिलेश यादव के पांच सालों के सामाजिक अन्याय की दास्तान......

अखिलेश जी कहते हैं कि 'मेरे काम को याद किया जाएगा...'
मैं भी कहता हूं ...जी हां अखिलेश जी आपके काम को जरूर याद किया जाएगा...लेकिन कैसे ......?

ये जरूर याद किया जाएगा कि आपने अपने कार्यकाल में चार वाइस चांसलर बनाए ..जिसमें से दो ब्राह्मण, एक ठाकुर औऱ एक ओबीसी बनाया.... एक भी पद SC, ST को नहीं दिया L
ये जरूर याद किया जाएगा कि आपने दलितों, पिछड़ों का हिस्सा काटकर सिद्धार्थ यूनिवर्सिटी मेे 84 में से 83 ब्राह्मणों को नियुक्ति दी...SC,ST को एक भी पद नहीं दिया |
ये भी याद किया जाएगा कि आपने ही ...ब्राह्मणों को खुश करने के लिए पिछड़ों - दलितों को मिलने वाले त्रिस्तरीय आरक्षण को खत्म करके एक तरह से इन समुदायों का संहार कर दिया
ये भी याद किया जाएगा कि आपने गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी में 95 फीसदी ब्राह्मणों को नियुक्ति दी..
ये भी याद किया जाएगा कि आपने ही सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में 53 में से 49 पद सवर्णों के लिए निकाले...
ये भी याद किया जाएगा कि आपने 74 यश भारती पुरस्कार बांटे . जिसमें से 45 यश भारती पुरस्कार ब्राह्णणों को बांट दिए. बचा खुचा गैर ब्राह्णण सवर्णों को दे दिया...औऱ रत्ती भर पुरस्कार ओबीसी को दिए..और एक भी पुरस्कार किसी SC, ST को नहीं दिया .
ये भी याद किया जाएगा कि आपने लखनऊ में पत्रकारों को 80 आवास बांटे जिनमें से 58 आवास ब्राह्मण जाति के पत्रकारों को बांट दिए और आलोक रंजन की कृपा के चलते 9 आवास लालाओं को बांट दिए और 8 आवास अपनी ससुराल पक्ष की जात वालों को बांट दिए. वाकी 2 आवास यादव जात को, 3 आवास मुसलमानों को दिए..
ये भी याद किया जाएगा कि आपने वोट तो यादव समेत पिछड़ो , दलितों औऱ मुसलमानों से लिए पर पार्क जनेश्वर मिश्रा के नाम पर बनाया...
ये भी याद किया जाएगा कि आपने ही यूपी के 30 जिलों में लेखपाल की परीक्षा में पिछड़ी जीति को रिजर्वेशन तक नही दिया..
ये भी याद रखा जाएगा कि आपने ही मुसलमानों को धोखा दिया और उनको रिजर्वैशन नही दिया...
ये भी याद किया जाएगा कि आपकी पार्टी ने ही दलितों को मिलने वाले प्रमोशन में आरक्षण का विल संसद में फड़वा दिया
ये भी याद रखा जाएगा कि आपकी पार्टी ने ही यूपी में 75 जिलों में से तकरीवन 60 जिलों में सवर्ण डीएम और एसपी को रखा ...जिन्होने दलितों पिछड़ो पर जमकर अत्याचार किए...
ये भी याद रखा जाएगा कि आपने अपनी छवि चमकाने के लिए सिर्फ यादव औऱ मुसलमानों का ही उपयोग किया...आपने अपने ही विधायक रामपाल यादव को पिटवाया, आपने ही रामवृक्ष यादव मथुरा की पुलिस से हत्या करवा दी. इसके बाद आपने ब्राह्णणों को खुश करने के लिए अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी आदि मुस्लिम नेताओं को बदनाम करके सपा से दूर कर दिया....
अखिलेश जी आपकी ब्राह्णण परस्त नीतियों को यूपी की दलित , पिछड़ी और मुसलमान जनता 2019 और 2022 में भी याद रखेगी .....
मुझे पूरी उम्मीद है कि यूपी की जनता आपको 2022 में 22 सीटों तक ही सिमटा देगी ..तभी आपकी समाजिक अन्याय की अकल ठिकाने आएगी...

12/03/2017

2017 के चुनाव परिणामों के मायने ?

2017 के चुनाव परिणामों के मायने ?
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सपा बसपा के उत्तर प्रदेश की राजनीती में बने रहने के पुराने ख़यालात को तोड़ने का श्रेय और गैर राजनितिक कार्य करने का दायित्व सपा और बसपा के नेताओं को देना वाजिब होगा। 
यहीं पर यह उल्लेख भी महत्त्वपूर्ण होगा की केंद्र में आयी सरकार की नियति और नीति साफ़ तौर पर संविधान प्रदत्त दलितों और पिछड़ों के हकों को समाप्त कर मध्यकालीन व्यवस्था को लागू करने की है जिसके लिए वह  अपनी तैयारी में लगा हुआ है जिसका राजनितिक विरोध न कर पाना ही मूलतः इन वर्गों की कमजोरी है। 
राष्ट्रीय जनगणना 2011 के लिए किये गए जातिवार जनगणना की रिपोर्ट न प्रकाशित करना और मंडल कमीशन के प्रावधानों को लागू करने के बजाय उन्हें तोड़-मरोड़कर समाप्त कर देना जिसका सारा दायित्व जनता पर नहीं उस वर्ग की राजनीती कर रहे नेताओं की है।  
जारी-----------


चुनाव परिणाम के पूर्व भोर में लिखा गया मेरा आलेख !
मित्रों आज का चुनाव परिणाम क्या आएगा ? 
इस पर ना जाते हुए हम आपका ध्यान कुछ ऐसे लोगों की तरफ ले जा रहे हैं जो आपके मध्य रह कर आपका अहित करते रहते हैं ! आप उन्हें पहचानने की कोशिश नहीं करते हैं और यदि आपको वह दिखाई भी दे जाते हैं तो आप के नेताओं की उन पर नजर ही नहीं जाती ? वे उन्हें नजर क्यों नहीं आते ?
मेरा आलेख ऐसे अवसर पर उन्ही को समर्पित है।
- डॉ.लाल रत्नाकर

मित्रों अमर सिंह आजकल किस दल में हैं यह बहुत सारे लोग जानते हैं ? लेकिन जिन लोगों को अमर सिंह का चरित्र केवल एक दलाल का ही पता था अब वे जान गये होंगे कि वह कितने बड़े जातिवादी हैं और सामाजिक न्याय के घोर विरोधी ? क्या उन्हें यह पता है कि उन के कल के बेवजह के बयान को भी जानना चाहिए कि समाजवादी पार्टी में इतनी गालियां खा कर के इतना अपमान सह करके वह आदमी क्यों बना हुआ है।
और समाजवादी पार्टी ने उन्हें राज्यसभा क्यों दी है इन सबका उत्तर में आपको आगे दे रहा हूं।
मूलत: अमर सिंह जिस तरह का चरित्र लगता है और वह कितना बहुरूपिया है उस का सबसे बड़ा प्रमाण कल उसके बयान से निकल कर के आया कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी नदी के दो किनारे हैं और वह आपस में कभी मिल नहीं सकते।
इसकी व्याख्या कर उसने केवल अपने जातिवादी सोच का घटियापन उजागर कर रहा है उसे यह नहीं पता कि प्रकृति के बहुत सारे आयाम मानव को जीने की कला सिखाते हैं और उन्हीं का अनुकरण कर मनुष्य जीवन जीता है माननीय अमर सिंह मान न मान मैं तेरा मेहमान की अवस्था में हर जगह अपना उपदेश करने लगता है जबकि नदी का निर्माण बिना दो पाटों के हो ही नहीं सकता?
इसलिए वह दोनों पाट या उसके किनारे एक तरह से आपस में मिले हुए होते हैं और साथ साथ चलते हैं और उन्हीं के मध्य नदियां कल कल कल करके बहती हैं वे बहती रहे इसलिए दोनों किनारों का होना बहुत जरूरी होता है जिस दिन वह किनारे कमजोर पडते हैं उस दिन नदी का तांडव पूरी कायनात को अपने आगोश में लेकर उस परिवेश को जल में समाहित कर लेता है । इसलिए अमर सिंह को यह पता है कि जिस दिन यह किनारे अपनी जगह छोड़कर एक साथ आ जाएंगे उस दिन अमर सिंह जैसे लोग जल मग्न हो जायेंगे ।
कौन कहे अमर सिंह की अमर सिंह जी अब तो जाने दीजिए क्योंकि जाति का स्वभाव इस देश में बना ही रहता है बहुत कम ऐसे लोग हुए हैं जो अपने जातिय स्वभाव से मुक्त हो पाए हैं ।
कम से कम यह आवाज जिस रूप में भी अखिलेश यादव की ओर से निकल कर आई है वह यह संदेश तो देती है कि अगर उनकी रक्षा और आप जैसे जातीवादियों से सुरक्षा नहीं हो सकती है तो वह बसपाइयों के साथ ही संभव है और मैंने बहुत पहले यह बात लिखी है कि तब तक सामाजिक बदलाव नहीं होगा जब तक सामाजिक रुप से दबे कुचले लोग और सदियों से अन्याय सहते आए हुए लोग एकजुट नहीं होंगे।
मुझे लगता है कि अखिलेश यादव को यह भान तो हो गया है लेकिन बहन जी को भी इस पर विचार करना होगा और बहुत ही खुले मन से उनके साथ खड़ा होना होगा और यदि ऐसा नहीं होता तो आने वाली सदियां इन दोनों लोगों को सामाजिक न्याय के असली दुश्मन के रूप में पहचानेंगी ।
यही कारण है कि अमर सिंह जैसे लोग समाजवादी पार्टी में और सतीश मिश्रा जैसे लोग बहुजन समाज पार्टी में अपनी जगह पक्की रखना चाहते हैं । क्योंकि वह यह जानते हैं कि जिस दिन इनका नियंत्रण इन दलों से हट जाएगा उस दिन यह लड़ते भिडते कहीं एक हो गए तो फिर उनका क्या हस्र होगा ?
हमें अखिलेश जी के इस बयान पर बौद्धिक स्तर पर सोचने की जरूरत है और देश के तमाम बुद्धिजीवियों से मेरा आग्रह है कि इस देश को बचाना है तो इन दोनों को एक साथ लाने के लिए और समता और समानता की राह पर चलने के लिए आंदोलन करना चाहिए और जन जन में इस भाव को बढ़ाना चाहिए कि बगैर इन दोनों की वैचारिकी के एक साथ आए ? किसी भी तरह से सामाजिक सरोकारों का सही-सही क्रियान्वन नहीं हो सकता ?
क्योंकि बाबा साहब अंबेडकर के बनाए हुए तमाम संवैधानिक अधिकारों को आज तक इन समाजों के लिए सही ढंग से उपयोग ही नहीं किया जा सका है, जिस के बहुत बड़े कारण वही लोग हैं जो आज तक सत्ता में विराजमान है।
बहुत सारी योजनाएं हैं जिनपर हमारे बुद्धिजीवी आपस में बहस तो करते रहते हैं और उनके अच्छे हल भी उनके पास हैं । लेकिन यह हमारे कूढमगज कथित राजनेता ब्राह्मणों और दूसरी दोगली और बेईमान कौमों से नियंत्रित होते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि समय आने पर वह उन्हें धोखा देता है और यह धोखा खाकर के आहत होते हैं लेकिन सुधरते नहीं हैं ।
अरे भाई जिन लोगों ने तुम्हें इस लायक बनाया है कि तुम उनका नेतृत्व करो तो कम से कम उनके बुद्धिजीवियों, वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, कलाकारों, साहित्यकारों,संगीतकारों, समाजसेवियों को तलाश करो, तैयार करो यही दायित्व दिया है समाज ने तुम्हें ।
उनकी व्याख्या पर मत जाओ वह तो तुम्हें गर्त में ले जाएंगे, अगर तुम्हारे लोग आगे आएंगे तो उनकी मदद के लिए उन लोगों को भी उनके साथ आना पड़ेगा जो आज तक उनका विरोध करते आए हैं उनकी प्रतिभा का, उनके हुनर का, उनकी मेहनत का, ऐसा नहीं है कि पिछड़ों दलितों में काबिल नहीं है, बुद्धिजीवी नहीं हैं, इनको रोका गया है उन्ही लोगों द्वारा जो तुम्हारे इर्द-गिर्द दिखते हैं, तुम्हारी दलाली करते हैं, गुमराह करते हैं और यह कोई आज की नहीं सदियों की सच्चाई है ।
जब जब किसी भी महापुरुष ने इस बात को समझा कि वह कौन लोग हैं जो समाज को ऐसी हालत में करने के लिए जिम्मेदार हैं उन्होंने उनका बहिष्कार ही नहीं किया बल्कि चिन्हित करके समाज को उनके खिलाफ खड़ा होने का आवाहन किया ।
कहते हैं कि अंग्रेजों ने भी इस बात को पहचाना था की इन ब्राह्मणों को किसी भी तरह की न्याय व्यवस्था से दूर रखो क्योंकि उनका चरित्र न्यायप्रिय नहीं होता ? वह हमेशा अपने प्रति बेईमान होते हैं अपने और अपनों के लिए बेईमानी करते हैं? अन्यथा इस विविध जातियों के देश में सदियों से मुट्ठी भर लोग 80,90 प्रसिद्ध जगहों पर कैसे काबिज हो जाते हैं क्या केवल उनके यहां बुद्धिमान ही पैदा होते हैं नहीं उनकी बुद्धिमानी यही होती है कि उनके लोग बेईमान होते हैं और दूसरों के प्रति ईमानदार नहीं होते, अपने कमजोर से कमजोर आदमी को देश की अच्छी से अच्छी जगह पर बैठा देते हैं ।
और आज सोने की चिड़िया कहा जाने वाला देश उन्हीं चन्द लोगों के हाथ में गिरवी पड़ा हुआ है। जिन्होंने इसे सदियों से लूटा है बेचा है और अपने लिए इस्तेमाल किया है। यहां के असंख्य लोगों को सत्ता और व्यवस्था से सदा दूर रखा है बाबा साहब के दिए गए अधिकारों को उन तक पहुंचने ही नहीं दिया है।
मैं हमेशा इस बात को कहता रहा हूं कि जब तक सामाजिक रुप से कमजोर लोग एक साथ खड़े नहीं होंगे तब तक हम लड़ाई जीत ही नहीं सकते और रोज हारते रहेंगे जीत कर भी।
मेरे साथियों समझो उनकी साजिश को समझो और आगे आओ खड़े हो जाओ यह मत देखो कि वह क्या कह रहे हैं । उनकी मत सुनो वह तो भेदभाव कर तुम्हें तोड़ रहे हैं कमजोर कर रहे हैं और तो और तुम्हारे बीच आपस में दूरियां पैदा कर रहे हैं इन्होंने सदियों से ही किया है।
यदि तुम्हें यह लगता है कि यह आवाज तुम्हें कौन दे रहा है तो तुम इस तरह से समझो कि-
मैं बुद्ध हूं 
मैं बाबा साहब अंबेडकर हूं 
मैं माननीय कांसी राम हूं 
मैं महात्मा फुले हूं 
मैं पेरियार हूं 
मैं ललई सिंह हूं 
मैं रामस्वरूप वर्मा हूं 
मैं मैं हूं 
जागो उठो खड़े हो जाओ 
मैं पिछड़ा हूं 
मैं दलित हूं 
और मैं मुसलमान भी हूं 
मैं अफसर हूं 
मैं शासक हूं 
मैं मुख्यमंत्री हूं 
मैं प्रधानमंत्री हूं 
मैं संविधान हूं
मैं दाता हूं 
मैं वकील हूं 
मैं डॉक्टर हूं 
मैं ज्योतिषी हूं 
मैं बुद्धिजीवी हूं 
मैं वैज्ञानिक हूं 
मैं इंजीनियर हूं 
मैं कवि हूं 
मैं कथाकार हूं 
मैं कहानीकार हूं 
मैं संगीतकार हूं 
मैं मजदूर हूं 
मैं कलाकार हूं 
मैं किसान हूं 
मैं स्वाभिमान हूं 
मैं सम्मान हूं 
तुम्हारे अपमान के खिलाफ हूं

मैं तुंहें पहचानता हूं और उन्हें भी पहचानता हूं जो तुम्हे धोखा दे रहे हैं जो तुम्हारे खिलाफ हैं ज़ो तुम्हारे साथ होने का नाटक कर रहे हैं और तुम्हें लूट रहे हैं उठो जागो एक साथ खड़े हो जाओ तुम्हारे अंदर बहुत क्षमता है तुम देश संभालो नहीं तो यह देश फिर से गुलाम हो जाएगा और इस को गुलाम बनाने वाला राहुल सांकृत्यायन द्वारा बताया गया वही बेईमान आदमी होगा जो तुम्हारा दुश्मन है।

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