3 दिस॰ 2017

सामाजिक न्याय मोर्चा


3 दिसंबर नेहरू सभागार आजमगढ़ में सामाजिक न्याय मोर्चा का सम्मलेन संपन्न। 
"हम लड़ेंगे जब तक दुनिया में लड़ने की जरूरत बाकी है"

साथियों !
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जब मैं यह आलेख तैयार कर रहा था तो यही उम्मीद थी की संघर्ष की धरती पर हमारे युवा जिस आवाज को  बुलंद करने जा रहे हैं निश्चित तौर पर वहां से क्रान्ति का आगाज़ होगा। 

आजमगढ़ के सभी साथियों से निवेदन है कि आप लोग देश के वर्तमान अलोकतांत्रिक भाजपा सरकार के खिलाफ संपन्न होने जा रहे सामाजिक न्याय सम्मेलन में सहभागी बने ताकि राष्ट्रीय स्तर पर बहुजनों के हक्क व अधिकार की लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाया जा सके तथा इस देश में हर व्यक्ति को रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याएं मुहैया कराने की हमारी लड़ाई धारदार बने आज जिस प्रकार से दलितों पिछड़ों के आरक्षण पर केंद्र सरकार के द्वारा लगातार कुठाराघात किया जा रहा है और आरक्षण को विभिन्न जातियों के आधार पर बांटने का प्रयास किया जा रहा है उसको विफल किया जाए संघ घोषित भाजपा कि केंद्र व राज्य की सरकारें लगातार आरक्षित वर्ग के लोगों के साथ खिलवाड़ कर रही है और आरक्षण को खत्म कर इस देश में गरीबों मजदूरों पिछड़ों दलितों और अल्पसंख्यकों के हितों को नजरअंदाज कर रही है उसके खिलाफ एक व्यापक जन आंदोलन बनाने की जरूरत है तो आइए 3 दिसंबर नेहरु सभा गार आजमगढ़ और इस महासम्मेलन में अपनी बातों को मजबूती से रखिए।

सामाजिक न्याय आंदोलन को लेकर के जिस तरह से उत्तर प्रदेश के युवा आज तक आक्रामक हैं और वह इस तरह के कार्यक्रम विभिन्न महानगरों में आयोजित कर रहे हैं उससे यह प्रतीत होता है कि एक नई विचारधारा सामाजिक न्याय को ले करके तैयार हो रही है दूसरी तरफ वर्तमान राजनीति के प्रांतीय राजनीतिक दलों के नेता इस विचार से बिल्कुल मुंह मोड़ चुके हैं और निरंतर उस आंदोलन की उपेक्षा कर रहे हैं जिसकी सामाजिक न्याय के पूर्वजों ने अपनी कुर्बानी देकर के हासिल किया था यही कारण है कि आज केंद्र में बैठी सरकार और उसके सिपहसालार सबसे ज्यादा हमलावर उन सामाजिक न्याय की जातियों पर हैं जो आरक्षण के आधार पर विभिन्न संस्थानों में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्षरत हैं।

यही नहीं विभिन्न तरीकों से सामाजिक न्याय के आंदोलन को कमजोर करने का जो सबसे बड़ा काम पिछड़ी जाति और दलित जाति के नेताओं द्वारा किया गया है वह किसी से छुपा हुआ नहीं है अब सवाल यह है कि किस तरह से उस आंदोलन को पुनर्जीवित किया जाए और आम आदमी तक यह आवाज पहुंचे कि हमारी जो वास्तविक लड़ाई है वह अपने किसी नेता को भगवान बनाने की नहीं है बल्कि अपने हक और अधिकार को हासिल करने की लड़ाई है और जिसे लड़ने के लिए किसी तरह से आयातित सेना नहीं लड़ सकती बल्कि वे लोग लड़ेंगे जिनके अधिकारों का सवाल है।

यह काम हमारे संघर्षरत युवा साथी जिसमें मनोज कुमार और गोरखनाथ सलमान से कर रहे हैं मेरी ऐसी शुभकामना है कि इन युवाओं को अपने साथ बहुजन के अन्य साथियों को भी जोड़ना चाहिए और आधी आबादी को भी साथ में लेना चाहिए जिससे समग्र सामाजिक न्याय का बिगुल बजाया जा सके एक तरह से हम यह भी कह सकते हैं कि समग्र न्याय की अवधारणा से ही आने वाले दिनों में हमारी जरूरतें पूरी होगी और उन पर हमें वैचारिक रूप से आगे बढ़ना होगा।

जो लोग शोषक जातियों के हथकंडे नहीं समझते उन्हें यह नहीं पता कि आज देश कांटेक्ट पद्धति पर लोगों को नौकरियां दे रहा है जिसमें आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं की गई है और धीरे-धीरे उन तमाम जगहों को अपने लोगों से भर कर के उन्हें परमानेंट कर देंगे और इस लड़ाई को हम न्यायालय में भी चुनौती नहीं दे पाएंगे इसलिए सरकार में भी हमें आना है सत्ता भी हमारी होनी है और हमें न्याय पालिकाओं में भी अपनी जगह बनानी है जिससे हर तरह की लड़ाई में हमारे लोग आगे रहें और हमारे साथ अन्याय हो सके।


आयोजन :



3 दिसंबर को बाबू चंद्रजीत जी की सामाजिक न्याय धरती धरती तथा कैफ़ी साहब के सामाजिक सौहार्द की धरती पर गूंजा सामाजिक न्याय..... सामाजिक न्याय के इस आजमगढ़ सम्मेलन में उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश सभाजीत यादव सहित विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव राजभर पूर्व सांसद रामकृष्ण पूर्व सांसद बलिहारी जी सामाजिक न्याय मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज यादव ने भाग लिया... दलित पिछड़ा अल्पसंख्यकों की लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए मनोज यादव ने कहा किस देश में एक कर प्रणाली हो सकती है तो एक शिक्षा की नीति क्यों नहीं हो सकती है ?इस देश को इस देश को विपक्ष मुक्त भारत नहीं बेरोजगारी, भुखमरी आतंकवाद मुक्त ,नक्सलवाद मुक्त ,भयमुक्त, लोक कल्याणकारी भारत बनाने की जरूरत है........


सम्मेलन को सफल बनाने में मुख्य रूप से आजमगढ़ के साथियों लव यादव जी, ऋषिदेव पिंकी यादव अरुण यादव,अशोक यादव मास्टर साहब संतोष यदुवंशम जी, हरेन्द्र वेनवंशी,अधिवक्ता रामजीत जी काविशेष आभार व धन्यवाद।

(गोरखनाथ के फेसबुक से साभार)

आलोक नाथ सामाजिक न्याय सम्मेलन,आजमगढ़, उ.प्र.।
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आजमगढ़ सामाजिक न्याय सम्मेलन कई मायनों में ऐतिहासिक रहा,और आजमगढ़,सामाजिक न्याय सम्मेलन में अपने चिरपरिचित अंदाज में शामिल हुआ।आज तक के सामाजिक न्याय मोर्चा के सामाजिक न्याय स
म्मेलनों में से सबसे अधिक सफल और दिशा के अनुरुप था। जन संपर्क के समय लोगों से मुलाकात और सम्मेलन में उपस्थित लोगों के हाव भाव से लग रहा था कि क्रांति की बीज बोई जा चुकी है, सिर्फ अंकुरित होना बाकी है।सम्मेलन में राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मनोज यादव, पूर्व सांसद श्री बलिहारी बाबू,पूर्व विधानसभा अध्यक्ष,श्री सुखदेव राजभर के संबोधन विशेष आकर्षण का केन्द्र था,के समय जनता अपने अधिकारों के उग्र होकर ताली पीटने और मेज थपथपाकर जता रही थी कि राजनीतिक ज्वालामुखी तैयार है, बस फूटने का बहाना खोज रही है।इस बहुजन जनता अधिकारों को पाने के लिए औ निजाम बदलने के लिए गंभीर थी।हम विश्वविद्यालय, कॉलेज के युवाओं पर विशेष जिम्मेदारी है कि समाज की मांशा को भांप कर दिशा जाए और बहुजनों राजनीति को बर्बाद होने से बचाया जाए।

आलोक नाथ सिंह 'भंटू'
सामाजिक न्याय मोर्चा

हमें अपनी आवाज़ बुलंद करने के लिए ऐसे ही आन्दोलनों की ज़रूरत है जिस दिन हमारी अवाम को इस बात का भान हो जाएगा कि जो हमारा नेतृत्व है वह नकारा है और उसे हमारे मुद्दों की जानकारी नहीं है वह केवल मेरे इमोशन का इस्तेमाल कर दलालों की नियत पर खेल रहा है और उनके इशारे पर काम कर रहा है तब हमारी अवाम का मन संघर्ष के लिए पुनः विचलित होगा और नया संघर्ष खड़ा होगा। तब हमें नए नेतृत्व की जरुरत पड़ेगी जो अभी नए नेतृत्व की उसी  ज़रूरत को पूरा  लिए खोज जारी रखनी है। और यह उम्मीद है की यह काम पूर्वांचल के नौजवानों द्वारा जल्दी ही संपन्न होगा जब वे मौजूदा परिवारवाद को चुनौती भी देगा और नेतृत्व भी। 

मेरी शुभकामनाएं और संघर्ष के लिए उन्हें प्रेरणा देना अपना कर्तव्य है और मैं हमेशा उनको नैतिक आंदोलन के लिए अग्रसर करने का काम करता रहूंगा ऐसा मेरा विश्वास है।



डॉ.लाल रत्नाकर



17 अक्तू॰ 2017

प्रसंगवश

(आप से अनुरोध है कि इसे आप पढ़ें पढ़ाएं और अपने मित्रों को भेजें और अपने फेसबुक पेज पर शेयर करें)

-डॉ. लाल रत्नाकर

मित्रों!

सामाजिक सरोकारों का संदर्भ आपके जीवन से जुड़ा होता है और सदियों से हम जिस पाखंड के शिकार हैं उसमें केवल और केवल कुछ खास वर्ग के लोगों का ही उत्थान हुआ है।

और वह उसी संतुष्टि के लिए नाना प्रकार के उत्सव का आयोजन करते हैं जिनमें उनका कौशल उनका पाखंड और उनकी कुटिलता छुपी हुई साजिश के तहत एक उत्सव के रूप में दिखाई देती है जिनके संतुष्टि के लिए ही पूरे समाज को उस पाखंड को स्वीकार करके ऐसे उत्सव के रूप में मनाया जाना प्रचारित है।
जिससे बहुजन की अस्मिता प्रभावित ही नहीं होती है अपमानित और लज्जित भी होती रहती है । ऐसे अपमान की पुनरावृत्ति होती है जिसे हम किसी अपराधबोध के साथ स्वीकार करते जाते हैं और उसका प्रतिवाद करने का साहस नहीं कट्ठा कर पाते।
और ऐसे समय में जब देश पर सामाजिक सरोकारों पर नए तरह के पाखंड का और इस तरह के त्योहारों का हमला है । जिसमें हमें सदियों से चले आ रहे पाखंड और ब्राह्मणवाद का ना तो एहसास होता है और ना ही महान होता है हम कई बार उन्हीं की श्रेणी में खड़े होते नजर आते हैं लेकिन हम कभी उनके साथ खड़े होते नजर नहीं आते जिनके विपरीत इस तरह के आयोजन बहुत योजनाबद्ध तरीके से किए जाते हैं।
आइए ऐसे समय में हमें एकजुट होकर के और अपने लोगों के प्रबुद्ध साथियों के साथ खड़े होते हुए अब तो हमें उस खतरनाक षड्यंत्र से सावधान हो करके एक नए विमर्श की शुरुआत करनी ही चाहिए ।
जैसा कि आप जानते हैं कि हमारे जितने भी उत्सव हैं उसके पीछे बहुजन के महत्वपूर्ण नायकों का किसी न किसी रूप में अपमान किया जाता है। और ऐसे अपमान का हम अपने उत्सव के रूप में मनाने के लिए वाध्य होते हैं क्योंकि हमें इस क्षेत्र में या इस विषय में सोचने के लिए कोई बिंदु ही नहीं दिखाई देता।
हमारे तमाम बहुजन नायकों ने इसी तरह के खतरों से हमें जगाया था और हमें जागरुक भी किया था। लेकिन मौजूदा समय के ऊन राजनेताओं की पाखंडी प्रवृत्ति ने हमें उन तमाम आंदोलनों से अलग करके पुन: पाखंड की ओर ढकेल दिया है ।
अगर हम समय रहते इस षड्यंत्र से न चेते तो हम अपनी आजादी की असली लड़ाई कभी भी नहीं लड़ सकते।
आइए हम नए तरह के विचार तैयार करें और अपने सम्मान के त्योहार मनाएं जिनमें: हमारा सम्मान हो हमारे नायकों का सम्मान हो: यथा
मित्रों !
आँख मूदकर हम जिसे उत्सव मानते हैं वह जश्न है 
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बहुजन नायकों की हत्या का जश्न ?
यही है सांस्कृतिक साम्राज्यवाद !
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राष्ट्रवाद 
हिन्दू राष्ट्रवाद 
यानि
ब्राह्मणबाद
अर्थात
मनुवाद
का पोशक
एकात्म
मानववाद
के रूप में
संविधान पर
हमला !
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संविधान बचाओ 
देश बचाओ !
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बहुजन समाज के लिए अनुकरणीय और अविस्मरणीय आलेख हमने ऊपर लगाया है जिसे किसी हमारे विद्वान साथी ने हमें किसी ने दीपावली का इतिहास लिख कर के भेजा है मेरे WhatsApp पर मुझे लगता है कि यह आप को भी पढ़ना चाहिए और "सांस्कृतिक साम्राज्यवाद" की जड़ में मट्ठा डालने का काम करना चाहिए अन्यथा यह समाज बचेगा नहीं और पूंजीपति सरकार में तो आ ही गया है आगे सरोकार में भी बना रहेगा.
मेरा ख्याल है किसका व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार हो और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को समूल नष्ट किया जाए तभी जाकर के सांस्कृतिक समाजवाद की अवधारणा का जन्म होगा अन्यथा हम पत्थर पीटते रहेंगे और ऐसे नेता पैदा करते रहेंगे जो घोर पाखंडी और ब्राह्मणवादी होंगे।

डॉ.लाल रत्नाकर
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साथियो ……
दरिद्र दीपावली में ही आया जब हमने अपना सब कुछ खर्च करके लूटा दिया।अतः बुद्धिमानी इसमे है कि हम अपना इतिहास जाने और उसको माने।इस दिवाली ऐसा करे तो जानें.......देश के सारे संसाधनो पर सांप की तरह कुंडली मारे बैठे शोषक वर्ग ( ब्राह्मण/ वैश्य) द्वारा आए दिन प्रतिनिधित्व, नौकरी, देश केमूलभूत संसाधनों व अन्य सुविधाओं को खत्म करने के आंदोलन खड़े किए जा रहे है। ताज्जूब है कि हम लोग इन्ही के रीति रिवाजों, त्योहारों,देवी देवताओं व व्यापार को मजबूत कर इस विष बेल को खाद पानी दिए जा रहे है। यदि इनकी जड़ों पर चोट करनी है तो इस दिवाली के धनतेरस को आप बाजार से कुछ भी नही खरीदें क्योकि वे सब हमारे घरों में पहले से हीहै। पूजापाठ नही करें और न ही मंदिर में चढावा दें। सिक्के,गहनें, मिठाइयां ,पटाखों आदि खरीद कर मेहनत का धन व समय बर्बाद न करें । यह सब नकली व मिलावटी चीजें बेच कर अपनी तिजोरियां भर रहे है। खरीद के लिए बिछाए गए पुष्य नक्षत्र व शुभ घड़ी के जाल में न फंसें । याद रखे भारत के बाजार में दलित पिछड़ा समाज सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग है हम मजदूरी या नौकरी से जितना कमाते है उसका बड़ा भाग बाजार में खर्च करते है ।कुरीतियों व कर्मकांडों में पसीने के पैसे को पानी की तरहबहा देते है इसलिए हमे आरक्षण विरोधियों के मंदिर व बाजार व्यवस्था पर चोट करना जरुरी है क्योकि शोषितों को पीछे धकेलने की साजिशें इन्हीं के दिमाग व धन से तैयार होती है।हममें अपार क्षमता है यदि दलित/ पिछड़े /आदिवासी ने करवट ली तो सामाजिक आर्थिक परिवर्तन मे देर नहीं लगेगी लेकिन इसके लिए आपको संकल्प लेना होगा।समय,धन,ज्ञानव श्रम का दान देना होगा । तथागत बुद्ध, फुले, शाहू जी महाराज व डॉ आंबेडकर के बताए मार्ग पर चलने से ही हमारा कल्याण है .....!

कृष्ण को पेंट करने का मेरा कोई धार्मिक आशय नहीं है वह एक ऐसे चरित्र हैं जिनमें अवश्य अनेक खूबियां डाली गई हैं और जो सबसे बड़ी खूबी है वह यह है कि वह स्त्रियों को बहुत प्रिय है और इतनी स्त्रियों के साथ उन्हें दिखाकर के जहां उनको रसिया कहा जाता है और रसिया के लिए जिस तरह की मान्यता कालांतर में स्थापित की गई है वह बहुत अच्छी भले ना हो।

लेकिन वही एक ऐसे व्यक्ति हैं जो लांछित किए जाने के बाद भी लांछित नहीं है बल्कि सर्वग्राही हैं।
कृष्ण चरवाहे हैं जैसे महिषासुर बहुजन नायक हैं उन्हें अपमानित करने के लिए भैंसे के रूप में रूपायित किया गया है लेकिन उनके भी इतिहास का कोई बहुत प्रामाणिक साक्ष्य नहीं है।

निश्चित तौर पर कृष्ण की अवधारणा भले ही काल्पनिक नहीं होगी । लेकिन जिस तरह से उनके चरित्र को रूपायित किया गया है वह निश्चित तौर पर कई जगह ब्राह्मण विरोधी दिखते हैं। 

कृष्ण को बहुजन नायक कहने में ज्यादा हिट हो सकता है बजाए भगवान बनाने के।

और कालांतर में धर्म के इंतजामकारों ने बहुतायत को अपने बस में रखने के लिए उनके नाम का इतना विस्तार किया होगा और देवता बना दिया होगा जैसे वर्तमान समय के राजनीतिज्ञों को पकड़ कर के वह घेर लेते हैं और अपने ही लोगों से दूर कर देते हैं।

हम कौन होते हैं उन्हें प्रमाणिकता देने वाले उनको बहुजन नायकों में ही माना जाना चाहिए क्योंकि जिंहें भगवान बना करके उनके नाम पर कोई खा रहा हूं इस बात का मैं पक्षधर नहीं हूं क्योंकि यह जानकारी यदि कृष्ण या किसी देवी देवता को हो तो वह ऐसा कदापि नही होने देंगे, क्या वास्तव में जिनको भगवान बना करके लूटा जा रहा है उस भगवान को इस बात की जानकारी है।

जी निश्चित तौर पर यह हुआ है। लोहिया जी से इस मसले पर चंदा पुरी ने बहुत सारे सवाल किए हैं जिनके वाजिब उत्तर लोहिया जी के पास नहीं थे।

मेरा यह चित्र "राम-कृष्ण-शिव" जिसे मैं लोहिया के पढ़ने के बाद बनाया था और उन की अवधारणा थी कि यह हमारे देश के सांस्कृतिक स्वरूप है जिसे हमने भगवान बना रखा है । और आप देख पा रहे होंगे कि इनके कैरेक्टरिस्टिक को मैंने रंगों के माध्यम से दर्शाने की कोशिश की है जिसमें मेरी तत्कालीन कला समझ मैं प्रेरित किया था कि मैं उन्हें चुन चित्रित करूं।

कालांतर में समाजवाद के स्वरूप को देख कर लिया भैया का समाजवाद तिरोहित हो गया और नए समाजवाद की अवधारणा से निहायत नफरत और मैंने फिर अपने चित्रों की दिशा गांव की ओर मोड़ दी थी दोबारा समाजवाद की तरफ मुड़ के भी नहीं देखा? जिस के क्या कारण हैं उसका उल्लेख यहां आवश्यक नहीं है!
जिस तरह से इनकी भगवान होने की अवधारणा चल रही है उससे काफी तरह से सामाजिक स्वरूपों में घालमेल मिला जो बिल्कुल इस तरह के चित्रों से विमुख कर दिया।
मेरा यह चित्र उन दिनों के मेरे कला कार्य का एक प्रचलित शैली का चित्र है जिसे भारत सरकार के पर्यटन विभाग में किसी महत्वपूर्ण स्थान पर लगा रखा है जिसे हम अब कई बार विशिष्ट अतिथियों के आगमन पर अखबारों में छपी उनकी तस्वीर के पृष्ठ भाग में देख पाते हैं।
यह कितनी विडंबना की बात है कि जिससे मैंने रचा है उसकी सूचना भी मुझे ठीक से नहीं है अब वह कहां है।
मेरे चित्रों की पहली सरकारी खरीद जिसे भारतीय पर्यटन निगम ने लिया।

29 सित॰ 2017

सामयिक आलेख - समाजवादी पार्टी

नेताजी श्री मुलायम सिंह यादव जी ! 
अखिलेश यादव जी को नेतृत्व सौंप देने के बाद पछताना ठीक नही.....
-चंद्र भूषण सिंह यादव 

(भाई  श्री चंद्र भूषण सिंह यादव लिखने के मामले में बहुत ही तत्पर रहते हैं और देश की विभिन्न परिस्थितियों पर इनका सामयिक आलेख हमें उससे राहत न देता हो पर विवरण जरूर दे देता है। सूचना क्रांति के दौर में यह उपयोगिता भाई चंद्र भूषण सिंह यादव के जरिये  हम तक पहुंचती ही रहती है। मैं तो समाजवादी पार्टी कोआजकल इन्ही के जरिये जानता हूँ।  श्री अखिलेश यादव जी इनकी बातों से कितने सहमत होंगें यह तो वह और यही जाने।  

यह सामयिक आलेख - समाजवादी पार्टी  के बारे में कितना प्रासांगिक है  वक़्त बताएगा  मुझे तो पहले भी जो जानकारी थी उसपर इनसे लम्भी वार्ता भी किया था लेकिन मुझे लगता है यह अपने राजनितिक समीकरणों के चलते उनसे वह सन्देश यह नहीं दे पाए थे, आजकल इनको वह कितना तरजीह वे दे रहे हैं मुझे उसका अंदाज़ा नहीं है।  पर एक बात अब भी है की श्री अखिलेश जी जिस राजनीती की दिशा में जा रहे हैं वह उन्हें नेता जी  (श्री मुलायम सिंह यादव ) की राजनीती से आगे ले जाती हुयी नहीं दिख रही है। 
--डॉ.लाल रतनाकर )                                           

श्री मुलायम सिंह यादव
(पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष समाजवादी पार्टी /संरक्षक)
नेताजी !
समय सदैव एक सा नही रहता। जो व्यक्ति आज सुपर स्टार है वह कल भी सुपर स्टार बना रहेगा,यह सम्भव नही है। स्थिति-परिस्थिति बदलती रहती है।आज जो शिखर पर है वह कल भी शिखर पर कायम रहेगा,यह कत्तई सम्भव नही है।नेताजी!आपने 78 बसन्त देखे हैं।तमाम उतार-चढ़ाव झेले हैं। एक से एक प्रभावशाली लोगों को बनते-बिगड़ते देखा है फिर नाहक का क्लेश क्यो लिए हुए हैं?

नेताजी !
आपने गांधी जी को देखा है। जिस गांधी ने कांग्रेस को देश मे जंग का हथियार बनाया।जिस गांधी के एक इशारे पर क्रांति की चिनगारी जली और एक इशारे पर बुझी वह गांधी भी कालांतर में कितने कमजोर हो गए थे,यह आपने देखा है।जब सत्ता और संगठन पर नेहरू-पटेल काबिज हो गए तो गांधी जी यह कहने के बावजूद कि मेरी लाश पर भारत-पाकिस्तान बनेगा,गांधी जी की कुछ न चली और देश बंट गया।गांधी जी के प्रति नेहरू और पटेल इतने अगम्भीर हो गए थे कि उनके सुरक्षा तक की कोई सुधि न रही गांधी जी द्वारा निर्मित सरकार के अंदर और प्रार्थना सभा मे वे गोली खाने को मजबूर हुए। गांधी जी ने चुपचाप कांग्रेस के चवन्निया मेम्बरशिप से त्यागपत्र देकर नेहरू-पटेल के जिम्मे कंग्रेस छोड़ दिया।गांधी जी समझ गए कि अब वे बूढ़े हो गए हैं,नेतृत्व नए हाथों में चला गया है इसलिए चुपचाप रहकर खुद की इज्जत बनाये रखी जाए।गांधी जी की वह चुप्पी ही आज उन्हें राष्ट्रपिता बनाये हुए है।यदि गांधी जी ने समय की नजाकत न समझी होती और नेहरू-पटेल से बगावत कर दिए होते तो गांधी आज भारतीय जनमानस के मानस पटल पर अमिट रूप में अंकित न रहते।

नेताजी ! 
कांग्रेस की इमरजेंसी और इंदिरा जी के क्रूर शासन के बिरुद्ध सम्पूर्ण विपक्ष को एकजुट करने वाले जयप्रकाश नारायण जी गांधी जी के बाद देश के दूसरे ऐसे महापुरुष हैं जिन्होंने सत्ता अपने द्वारा तैयार सँघर्ष की जमीन से लिया पर खुद पद न लेकर दूसरे लोगो को सत्ता सौंप दी लेकिन आप गवाह हैं कि सत्ता पाए लोगो ने जेपी के जनता के नाम सम्बोधन में उल्लिखित किसी बात को पूर्ण नही किया और जेपी खुद की आहुति से निकली सत्ता द्वारा तिरस्कृत हुए परन्तु उन्होंने जब नेतृत्व दूसरों को दे दिया था तो उसे सहज तरीके से स्वीकार कर लिया तभी वे आज भी गैर कांग्रेसी धारा के बीच स्तुत्य हैं और यूपी/बिहार में जेपी का नाम लिए बिना गैर कांग्रेसी धारा की कल्पना नही की जा सकती है।

नेताजी !
आप ने 1992 में समाजवादी पार्टी बनाई और उसे यूपी में शिखर पर पंहुचाया।तमाम दिग्गज लोगो को चरखा दांव लगाते हुए आप सैफई के मुलायम से दुनिया के शीर्ष नेताओं के बीच जोखिम उठाने वाले बहादुर मुलायम के रूप में पहचान बनाये।नेताजी! आपने 2012 में चाहे जिन परिस्थितियों में अपने सुलायक बेटे अखिलेश यादव जी को खुद के नाम पर प्राप्त सत्ता सौंप दी।अखिलेश यादव जी टीपू से टीपू सुल्तान बन गये और यूपी को अपने कौशल से तरक्की की तरफ ले गए। 2016 के अंत मे आप द्वारा पता नही किन कारणों से स्पष्ट रुख न अपनाए जाने से पार्टी में विवाद बढ़ा और वह विवाद 01 जनवरी 2017 को अपने चरम पर आ गया और भारी मन से समाजवादी पार्टी को आपको राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाकर अखिलेश यादव जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना पड़ा था।नेताजी! कैसी परिस्थिति जन्म ले ली कि वह टीपू आपके पद को ले लिया जो मुख्यमंत्री रहते सार्वजनिक तौर पर डांट सुन मुस्कुराता रहता था, हाथ से माइक छीन लिए जाने के बावजूद उफ न किया था,मंच से फफक के रो पड़ा था पर आपको कभी उलाहना न दिया था,बचपन मे खुद का नाम अखिलेश रखा था पर आपके समक्ष खड़े होने की हिम्मत न किया था।नेताजी! आपने न चाहते हुए अखिलेश जी से पदोन्नति में आरक्षण का विरोध करवाया,त्रिस्तरीय आरक्षण वापस करवाया पर अखिलेश जी ने अपने राजनैतिक नफा-नुकसान अथवा अपने वर्ग के हित-अनहित का ख्याल किये बिना आपकी बात को मानकर अपनी शाख को दांव पर लगा दिया।नेताजी!अखिलेश जी भले ही मुख्यमंत्री थे पर उनकी हर फाइल आपके नजरो के सामने से होकर गुजरती थी।
अपने मन का सचिव तक नही रख सके थे अखिलेश जी।नेताजी! आपने अनीता सिंह जी को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी की हर कार्यबृत्ति की स्क्रीनिंग हेतु नियुक्त कर रखा था।नेताजी!अखिलेश जी ने जनेश्वर मिश्र पार्क,एक्सप्रेस वे,जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र,मेट्रो,लोक भवन सहित सम्पूर्ण महत्वपूर्ण परियोजनाओं का लोकार्पण आप से ही करवाया फिर भी वे आप द्वारा डांट खाते रहे।नेताजी!ऐसा बेटा कहाँ मिलेगा जो आपकी डांट सुनकर मुस्कुराता रहे और प्रतिक्रिया में कहे कि मुझे पता ही नही चलता कि नेताजी कब राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका में तो कब पिता की भूमिका में आ जाते हैं?नेताजी!कुल के बाद जब आपने 2012 में अखिलेश यादव जी को नेतृत्व सौंप दिए तो फिर अब उस नेतृत्वकर्ता अखिलेश यादव जी को ही सजाने-संवारने का काम होना चाहिए न कि रोज-रोज की यह किचकिच कि अब थूका कि तब थूका।नेताजी!अब थूकने का काम बंद होना चाहिए।आपने समर्थ हाथों में जब नेतृत्व सौंप दिया है तो गांधी और जयप्रकाश की तरह भूतकाल की घटनाओं को देखते हुए यथार्थ को समझते हुए अखिलेश यादव जी को अपना स्नेहिल आशीर्वाद दें तथा कुछ लोगो की रोज-रोज की खुजली को मिटा दें।नेताजी!हम जिसे इतिहास कह रहे हैं उसे आपने देखा,जिया और भोगा है।इतिहास गवाह है कि जिस गांधी और जयप्रकाश ने कांग्रेस या जनता पार्टी को जन्म देकर प्राण दिया वही उसके फलदार होने पर किनारे कर दिए गए लेकिन उन लोगो ने खुद को संभाला और देश की राजनीति में आज बिना किसी पद पर रहे पूजनीय इतिहास बना कर चले गए हैं।

नेताजी !
देश बड़े नाजुक दौर से गुजर रहा है।हम सब की छोटी सी चूक हमे गर्त में पँहुचा सकती है।हम सबको समय की नजाकत को भांपते हुए अखिलेश यादव के नेतृत्व को मजबूत करते हुए खुश होना चाहिए कि इतना सुलायक पुत्र है आपके पास पर नेताजी शरीफ से शरीफ आदमी बेवजह डंडा करने से विद्रोह कर जाता है जो होता तो आत्मघाती ही है।

नेताजी !
अब आपको इतिहास बनाने हेतु प्रयत्नशील होना चाहिए।लेखन,उद्बोधन आदि में नीतिगत बातें आनी चाहिए।सामाजिक न्याय का एजेंडा प्रभावशाली भूमिका में होना चाहिए।नेताजी!अखिलेश यादव जी आपके लिए एक आदर्श पुत्र हैं जो आपका नाम लेते ही आंखों से डबडबा जाते हैं।नेताजी!आप भी गांधी जी और जेपी जी की तरह सत्ता को अखिलेश यादव जी को सौंपने के बाद नीति,कार्यक्रम,विचार आदि पर जमकर प्रशिक्षण चलाइये।भारतीय जनता पार्टी का मोहरा बन व बना रहे लोगो से सतर्क हो अपना इतिहास बनाईये और यूपी से देश मे परिवर्तन का आगाज करिए।

9 अग॰ 2017

मण्डल और लालू

("भाई चंद्र भूषण सिंह यादव जी हमारे समाज के उन सजग साथियों में हैं जो बेबाकी से अपनी राय पयुक्त समय पर देते रहते हैं हम उअन्के इस विचार को उअन्के फेसबुक पेज से ले रहे हैं। " 
साभार 
-डॉ.लाल रत्नाकर )

मण्डल कमीशन के लिए लालू प्रसाद यादव जी ने खुद को दांव पर लगाया....
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 --चंद्र भूषण सिंह यादव 
चंद्र भूषण सिंह यादव 

मैं यह कहूँ कि "मण्डल कमीशन" के लिए लालू प्रसाद यादव जी ने खुद को दांव पर लगा दिया तो कोई अतिशयोक्ति न होगी क्योकि मैं 1990 के मंडल आंदोलन का गवाह हूँ और इसके लिए डंडे खाने से लेकर जेल जाने,दिल्ली/लखनऊ/गोरखपुर/देवरिया में प्रदर्शन/रैली/आन्दोलन करने में शामिल रहा हूँ।मैं मण्डल आंदोलन के दौर में देवरिया युवा जनता दल का जिलाध्यक्ष था इस नाते मण्डल आंदोलन में जिम्मेदारी कुछ ज्यादे ही थी और उस दौर की घटनाएं आज भी जेहन में बिलकुल तरोताजा हैं।


लालू प्रसाद यादव जी 1989 में बिहार का मुख्यमंत्री बनने कर बाद बिहार में दबे-कुचले लोगो को तेजी से उभार रहे थे।वे सदियों से दबाए गए लोगो मे उत्साह का संचार कर रहे थे।बिलकुल निचले पायदान पर खड़ी जातियों में नेतृत्व पैदा करने का कार्य बिहार में लालू जी कर रहे थे।दिल्ली में जनता दल की राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार सत्त्तासीन थी।वी पी सिंहः जी प्रधानमंत्री तो देवीलाल जी उप प्रधानमंत्री थे।चन्द्रशेखर सिंह जी प्रधानमंत्री न बन पाने से आहत थे लिहाजा वीपी सिंह जी को पदच्युत करने का लगातार अभियान जारी रखे हुए थे।धीरूभाई अंबानी जी चन्द्रशेखर जी के मित्र थे,वे चन्द्रशेखर जी को प्रधानमंत्री बनाने हेतु कुछ भी कर गुजरने पर आमादा थे।देवीलाल जी ने वीपी सिंह जी के विरुद्ध बिगुल फूंक दिया और वीपी सिंह जी की सरकार गिरने की तरफ अग्रसर हो गयी।लालू जी,शरद जी और रामविलास पासवान जी की तिकड़ी एक साथ थी।इन तीनो नेताओ ने वीपी सिंह जी से जनता दल के घोषणा पत्र में उल्लिखित मण्डल कमीशन की याद दिलाई और इसे लागू करने का सुझाव दिया।मैं धन्यवाद दूंगा वीपी सिंह जी को जिन्होंने अलोकप्रियता का ख्याल किये बगैर तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद 7 अगस्त 1990 को मण्डल लागू करने का ऐलान कर दिया।मण्डल कमीशन लागू करने की घोषणा के बाद भारतीय जनता पार्टी असहज स्थिति में आ खड़ी हुई और उसने आडवाणी जी के नेतृत्व में रामरथ का दौरा तेज कर दिया।वीपी सिंह जी की सरकार मण्डल कमीशन लागू करने के बाद पदच्युत हो गयी। 


आडवाणी जी का रामरथ कमण्डल लेकर मण्डल को निगलने हेतु निकल पड़ा था,पूरा देश मण्डल-कमण्डल में बंट गया था।चन्द्रशेखर जी प्रधानमंत्री बन गए थे।मण्डल कमीशन की लड़ाई सड़क से लेकर कोर्ट तक चल पड़ी थी।लालू प्रसाद यादव जी मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करते हुए उत्तर भारत में मण्डल कमीशन की लड़ाई के नायक के रूप में आगे आ गए थे।शरद जी को मण्डल रथ से उत्तर भारत में मंडल कमीशन के पक्ष में जमीन तैयार करने के लिए मधेपुरा से लालू जी ने झंडा दिखाके रवाना किया था।लालू जी ने जगह-जगह मण्डल कमीशन के पक्ष में रैलियां की।वर्षो तक मण्डल की लड़ाई को अंजाम तक पंहुचाने के लिए लालू जी सड़क,सदन और सर्बोच्च न्यायालय में लड़ते रहे।लालू जी ने बिहार,यूपी सहित देश के अनेक राज्यो में रैलियां की,पटना,लखनऊ,दिल्ली में सम्मेलन व रैलियां हुईं।जेलभरो आंदोलनों से लेकर प्रदर्शनों का लंबा दौर चला।लालू जी ने इंदिरा साहनी केस में मण्डल कमीशन की लड़ाई जीतने हेतु रामजेठमलानी जी को खुद द्वारा सुप्रीम कोर्ट में वकील रखा।लालू जी सुप्रीम कोर्ट में दायर मुकदमे की पैरवी अपने निजी केस की तरह देखते हुए पैरवी में लगे रहे।लालू जी के सद्प्रयासों,मेहनत,दृढ़ निश्चय से मण्डल कमीशन 7 अगस्त 1990 को लागू किये जाने की घोषणा के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा 16 नवम्बर 1992 को फैसला कर लागू करने की तरफ बढ़ सका।लालू जी ने रामजेठमलानी जी के आरगूमेंट से और तमाम साक्ष्यों को प्रस्तुत करवाके अपनी ऐंडी-चोटी लगा करके सुप्रीम कोर्ट से मण्डल के पक्ष में फैसला दिलवाने में महती भूमिका निभाई जिसकी बदौलत श्री एमएच कानिया जी के नेतृत्व की बहुसदस्यीय खंडपीठ ने कुछ विसंगतियों के साथ इस ऐतिहासिक मण्डल कमीशन को लागू करने का फैसला सुना दिया।

लालू जी मण्डल कमीशन को छूकर छोड़े नही बल्कि मण्डल कमीशन को उसके लागू होने तक पीछा करते रहे।लालू जी ने मुख्यमंत्री रहकर पद का उपभोग करने,अभिजात्य वर्गो का दुलारा बनने हेतु अपने वर्गीय हित को तिलांजलि देने का अन्य लोगो की तरह अपराध नही किया।लालू जी ने अलोकप्रियता भोगा, गालियां सुनी लेकिन मण्डल कमीशन के मुद्दे पर समझौता नही किया।बिहार के तमाम या यूं कहें प्रायः सभी पिछड़े-दलित नेताओं की तरह स्वहित में अभिजात्य वर्गो व इन अभिजात्य वर्गो की पार्टियों के समक्ष समर्पण करना लालू जी ने स्वीकार नही किया जिसका खामियाजा लालू जी सीबीआई उत्पीड़न,जेल जाने,चाराचोर कहलाने के रूप में भुगते है और भुगत रहे हैं।

सोचने की बात है कि कोई चैनल,मीडिया,सरकारी एजेंसियां,देश के अभिजात्य वर्ग की पार्टियां या हमारे समाज के कथित ईमानदार बुद्धिजीवी जगन्नाथ मिश्र जी को चाराचोर नही कहते जबकि चारा घोटाले का भंडाफोड़ करने वाले लालू जी चाराचोर के रूप में ख्यातिप्राप्त हैं।क्या हम सबने यह सोचा है कि लालू जी को डिस्क्रेडिट करने के लिए उनका मखौल क्यो उड़ाया जाता है?लालू जी ही देश की सीबीआई,मीडिया,राजनैतिक घरानों के टारगेट क्यो हैं?क्या इस देश मे लालू जी से बड़े-बड़े पूंजी खोर अन्य नेता नही हैं?कुछ वर्षों में 300 गुना सम्पत्ति बढ़ाने वाले नेताओं के वहां सीबीआई क्यो छापे नही डालती?मैं स्पष्ट तौर पर कह सकता हूँ कि लालू जी ने इस देश मे दो बड़े अपराध किये हैं जिसकी सजा उन्हें अभिजात्य वर्ग द्वारा मिलनी ही है।लालू जी ने पहला अपराध पिछडो की वकालत कर उन्हें मण्डल कमीशन दिलवाने व लागू करवाने का किया है और दूसरा अपराध आडवाणी जी की रथयात्रा रोक करके भाजपा को दशकों पूर्व दिल्ली की सत्ता में आने से रोकने का किया है।लालू जी ने सामाजिक न्याय एवं साम्प्रदायिक सद्भावना के एजेंडे को अपने जीवन का आदर्श बनाके इस देश के अभिजात्य समाज को नाराज करने का जो अपराध किया है उसकी सजा लालू एवं लालू के परिवार को भोगना ही है।

भारतीय धर्मशास्त्र गवाह हैं कि जिन गैर सवर्णो ने इस देश मे वंचितों की बात किया है वे कथित भगवानों मसलन विष्णु,इंद्र,नरसिंह,राम,बामन आदि के द्वारा मारे गए हैं।जिस किसी अनार्य राजा ने मनु के विधान के इतर आवाज उठाई या कार्य व्यवहार किया वे बलि,हिरणकश्यप,रावण,महिषासुर आदि के रूप में विद्रूप कर हत दिए गए और उनकी हत्या पर जश्न मनाया गया जैसे आज लालू जी को चाराचोर कह जश्न मनाया जा रहा है।
मेरे ख्याल से अभी गनीमत है कि दुनिया की निगाहें पड़ने,लोकतंत्र होने और अम्बेडकरी संविधान लागू रहने से लालू जी का वध नही किया गया है वरना यदि सामाजिक न्याय एवं धर्मनिरपेक्षता का झंडा बुलंद करने का कार्य लालू जी कुछ सौ वर्ष पूर्व किये होते तो वे भी इन कथित असुरों की श्रेणी में सूचीबद्ध कर उन्ही के हश्र को प्राप्त हो गए होते।

मैं निःसंकोच लालू जी को "7 अगस्त मण्डल दिवस" पर कह सकता हूँ कि मण्डल का हीरो "लालू" ही हैं।मैं इस मण्डल नायक को मण्डल दिवस पर सलाम करता हूँ और इनके दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ।

7 अग॰ 2017

श्री चंद्र भूषण सिंह यादव का सुझाव


साथियों------! 

यह लेख भले ही एक खुले खत के रूप में श्री अखिलेश यादव जी को लिखा गया हो पर श्री चंद्र भूषण सिंह यादव ने इसमें मंडल राजनीती और पिछड़े वर्ग (समूह) को एकजुट करने पर जो बल दिया है वह केवल अखिलेश जी  लिए नहीं बल्कि उन तमाम नेताओं के लिए है जो किसी भी तरह से भटक गए हैं। यदि यहाँ उन्हें इस पत्र को सम्बोधित कर दिया जाय तो बहुत कुछ उनके भी यही हाल है ? अभी हाल में ही बिहार के मुख्यमंत्री का खेल भी इसी नजरिये से देखा जा सकता है। 

लब्बो लुबाब भाई श्री चंद्र भूषण सिंह यादव ने जिस बेबाकी से अखिलेश जी को सुझाया है यदि वे वक़्त रहते इस मुद्दे को नहीं उठाते और पूरी जमात में शरीक नहीं होते तो अपना भविष्य वह तय कर चुके हुए मान लिए जाएंगे। 

हालांकि उनके अल्पकालीन और परिवार के दीर्घकालिक स्वाभाव को देखते हुए इसकी उम्मीद न के बराबर ही है क्योंकि उनके मन की अवधारणा में यह विषय तो कहीं दीखता नहीं है, अभी जो कुछ कह रहे हैं उसके लिए न तो उनकी निति में कुछ है और न ही नियति में। 
फिर भी ------!
श्री चंद्र भूषण सिंह यादव के इस आलेख को मैं इस अपेक्षा से यहां लगा रहा हूँ की उन्हें ख़ुशी होगी और यह ब्लॉग उनका आभारी रहेगा। 

(साभार : श्री चंद्र भूषण सिंह यादव की फेसबुक से लिया गया है)

सादर 
डॉ. लाल रत्नाकर 

"7 अगस्त मण्डल दिवस पर" 


"7 अगस्त मण्डल दिवस पर" 

श्री अखिलेश यादव जी के नाम खुली चिट्ठी-

"आरक्षण वंचितों का प्राण तो तीसरी धारा की राजनीति करने वाले दलों का मूलाधार है।"......



आदरणीय श्री अखिलेश यादव जी,

सादर 
जय भीम ! जय मण्डल !!
परमादरणीय श्री अखिलेश यादव जी! आरक्षण पर लम्बी प्रतीक्षा के बाद आपके इस बयान को पढ़कर कि "आबादी के आधार पर सभी जातियों को मिले आरक्षण",खुशी हुई कि चलो देर से ही सही समाजवादी पार्टी ने आरक्षण पर मुंह तो खोला।हमारे पुरखो ने आरक्षण के बाबत यही नारा लगाया है कि "जिसकी जितनी संख्या भारी,उसकी उतनी हिस्सेदारी" ,जिसे आपने बोलकर अभिनन्दनीय कार्य किया है।

मेरे जैसे असंख्य समाजवादियों को तब बड़ी निराशा हुई थी जब आपके नेतृत्व में गठित पिछ्डों की सरकार ने त्रिस्तरीय आरक्षण वापस लिया था,पदोन्नति में आरक्षण का डंके की चोट पर विरोध किया था,ठेको में दलितों के आरक्षण को खत्म किया था तथा मण्डल कमीशन को तिलांजलि दे आरक्षण विरोध की तरफ कदम बढ़ा दिया था।मुझे तब और भी घनघोर निराशा हुई थी जब आपने 2017 विधानसभा का चुनाव घोषणा पत्र जारी किया था।इस घोषणा पत्र में बहुसंख्य जन कल्याणकारी बातें लिखी थी पर आरक्षण एवं पिछड़ा वर्ग नदारद था।चुनाव का समय होने के कारण मैंने कलम तोड़कर सोशल मीडिया से लेकर सोशलिस्ट फैक्टर सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में आपके पक्ष में लिखा था क्योकि कुल के बावजूद उम्मीद भी आप या आप की तरह की जमातों से ही है इसलिए लाख कमियों के बावजूद उम्मीद की किरण जहाँ दिखती है,व्यक्ति वहीं रहता है।हमने भी तमाम विसंगतियों के बावजूद आपकी तरफ सदैव आशा भरी उम्मीद रखी है कि कभी तो आप अपने असली लाइन-लेंथ पर बालिंग/बैटिंग करेंगे?

अखिलेश जी!भारतीय राजनीति के संदर्भ में जाति और धर्म शाश्वत सत्य हैं।यह अमेरिका या ब्रिटेन नही है कि विकास,काम,योग्यता,अच्छाई, नेकी और सहृदयता पर वोट मिल जाएगा।यह भारत है जहां अच्छाई और काम का कोई मतलब नही,यहां जाति और धर्म की राजनीति प्रभावशाली है।हम जिस वेद,पुराण,महाभारत,रामायण,गीता,मनुस्मृति आदि को आदर्श मानते हैं वहां जाति, धर्म,लिंग आदि के आधार पर जबर्दश्त भेदभाव हुवा है और उसी के मुताविक इंतजाम का आदेश/निर्देश है।हमारे धर्मशास्त्र नीति की जो बात करते हैं वहां क्या है,यदि हम तार्किक दृष्टि से विवेचना करेंगे तो पाएंगे कि इन नीति निर्देशो में केवल और केवल अनीति ही भरी पड़ी है।राजसत्ता के लिए कैसे-कैसे पाप नही किये गए हैं?छल से एकलब्य का अंगूठा काटना,निर्दोष शम्बूक का वध करना, सत्यवादी युधिष्टिर से "नरो वा कुंजरो" कहलवाक़े मरने को विवश करना,सूर्य को ढककर शाम का मंजर बनाके जयद्रथ को मरवाना,शिखंडी का प्रयोग करके भीष्म को साधना,गर्भवती सीता को जंगल छोड़ना,अकेली और निर्दोष सूर्पनखा का नाक-कान काटना आदि अन्यान्य दृष्टांत केवल और केवल यही दर्शाते हैं कि जाति, लिंग,वर्ण आदि के आधार पर अन्याय करके ही यहां राजसत्ता पर काबिज हुवा जाता रहा है।

अखिलेश यादव जी! भारतीय सन्दर्भ में आप आस्ट्रेलिया,जर्मनी,अमेरिका या जहां आप अक्सर जन्मदिन मनाने जाते हैं ब्रिटेन का मापदंड अपनाएंगे तो सफलता क्या असफलता के आखिरी पायदान पर रहना पड़ेगा।बहुत सोच-समझ के समाजवादी पुरखो ने जो सभी के सभी बड़ी जातियों के थे मसलन लोहिया,जयप्रकाश,नरेन्द्रदेव,एस एम जोशी,मधु लिमये,मधु दण्डवते,राजनारायण,अच्युत पटवर्धन आदि ने "सोशलिस्टों ने बांधी गांठ,पिछड़े पावें सौ में साठ" का नारा लगाया था।वे सभी के सभी बड़ी जाति के समाजवादी लोग यूं ही नही यह नारा दिए थे,इस नारे को देने के पीछे बहुत बड़ा सामाजिक,राजनैतिक कारण था।वे जानते थे कि नेहरू को गांधी का वरदान प्राप्त है ऐसे में इस देश के वंचितों की बात करके ही हम खड़े हो सकते हैं तो समाजवाद का यही तकाजा भी है कि उस विपुल आबादी को सामाजिक आजादी मिले जिसे हजार वर्ष से सामाजिक,राजनैतिक,सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से जाति और धर्म के आवरण में बांध करके दास या गुलाम बना के रखा गया है।

अखिलेश जी! इन सवर्ण समाजवादी पुरखों के पिछड़ा परस्ती के पीछे दो बातें थीं,पहला इन वंचित तबकों को हजारो वर्ष बाद न्याय मिले तो दूसरा इन सत्ता से वंचित समाजवादियों को मजबूत आधार।भारतीय राजनीति में पिछड़ा वर्ग और समाजवादी पार्टी एक दूसरे के पूरक बने और लम्बे समय से समाजवादी धारा और पिछड़ा वर्ग साथ-साथ रहे जिसकी परिणति 7 अगस्त 1990 को मण्डल कमीशन की घोषणा के रूप में सामने है।

अखिलेश जी! मुलायम सिंह यादव जी,शरद यादव जी,चन्द्रजीत यादव जी,लालू प्रसाद यादव जी,रामविलास पासवान जी आदि नेताओ को जब पत्र लिखा जाता रहा है तो वे लोग उसे पढ़ते और फिर जबाब देते रहे हैं पर मैंने तमाम अवसरों पर बिन मांगे आपको राय देने की हिमाकत करते हुए फोकट का रायदाता बनने का कार्य किया है लेकिन मुझे लगता है कि आपने मेरे पत्रों या सुझावों को इस लायक नही समझा कि उसे फॉलो किया जाय या उनका क्रियान्वयन किया जाय।आप शायद उन्हें पढ़ने की जहमत ही नही उठाये होंगे वरना निश्चय ही वे क्रियान्वित हुए होते तथा जबाब आया होता।खैर मेरे जैसे लोग विचारधारा के स्तर पर थेथर कहे जाएंगे क्योकि इतने के बावजूद हम फिर लिख रहे हैं परंतु तरीका बदल गया है।इस बार हम सोशल मीडिया पर आपके नाम खुला पत्र डाल रहे है क्योकि हमे उम्मीद है कि सोशल मीडिया पर लिखे गए मेरे खुले पत्र पर और भी कुछ नए विचार या संशोधन आ पाएंगे जो समाजवादी या पिछड़ा वादी राजनीति के लिए मील का पत्थर साबित होगे।


अखिलेश जी! मुझे इस बात का इल्म है कि आप ऑस्ट्रेलिया में पढ़े,डिम्पल जी से जातितोड़ शादी किये,मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव जी के बेटे के रूप में सामाजिक मान्यता पाए तथा होश संभालते ही जय-जयकार के नारों के साथ मुख्यमंत्री बन गए इसलिए जाति और धर्म के जमीनी हकीकत से रूबरू नही हुए अस्तु आपको अपने काम पर वोट मांगने में विश्वास रहा।मैं आपको बहुत दोष नही दूंगा कि आपने जाति,धर्म,बाहुबल आदि का प्रयोग क्यो नही किया?आप तिकड़म,इन विविध किस्म के जाल-बट्टों से इतर स्वच्छ और पारदर्शी राजनीति करने के हिमायती बनकर यूपी में पांव जमाना चाहते थे लेकिन यह जो हजार वर्ष की सामाजिक विद्रूप राजनीति है वह आपके मंसूबो को धराशायी कर दी,जिसे शायद अब आप महसूस कर रहे हैं।
अखिलेश जी! देखिये न आप कह रहे हैं कि "जिसके हर जाति में दो-चार मित्र नही वह समाजवादी नही",आप कह रहे हैं कि "काशी नही बना क्योटो,बुलेट ट्रेन का पता नही" और अमित शाह जी कह रहे हैं कि "यादव-जाटव जोड़ो।"अमित शाह यह समझ गए हैं कि जातियों की राजनीति किये बगौर भारत मे सत्ता हासिल नही की जा सकती है इसी नाते भाजपा ने पहले गैर यादव पिछडो औऱ गैर जाटव दलितों को साधा जबकि अब वे पिछडो की बिपुल आबादी यादव एवं दलितों की बिपुल आबादी जाटव को साधने की फिराक में हैं। दलित मतों को साधने हेतु भाजपा ने रामदास अठावले,उदित राज एवं रामविलास पासवान आदि को पहले ही अपने खेमे ले ले चुकी है जबकि अब वह जाटव को अपनाने की युगत में है इसी तरह उसका पाशा यादव पर फेंका जाने वाला है जिसके तहत सोनू यादव के घर सहभोज किया जा चुका है।अखिलेश जी!जाति की ताकत देखिये कि देश के प्रधानमंत्री मोदी जी गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए "घांची" जाति जो मारवाड़ी की उप जाति थी,को पिछड़ी जाति में अध्यादेश ला शामिल कर खुद की कलम से खुद ही पिछड़ी जाति में शामिल हो गए।प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनने के बाद खुद को नीच जाति बता करके वे वंचितों की विपुल आबादी में यह संदेश दे बैठे कि मोदी इस देश का एक नीच पिछड़ा है जो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर इन छोटी जातियों का स्वाभिमान बढ़ाएगा जबकि आप और आपके पिताजी श्री मुलायम सिंह यादव जी सवर्ण परस्त बनने के लिए सन्सद में पदोन्नति आरक्षण बिल फाड़ रहे थे तो सभाओं में इसके बिरुद्ध ललकार रहे थे। अखिलेश जी!सोचिए कि आपका पाशा कैसे उल्टा पड़ा कि सवर्ण आपके पाले में आया नही और पिछड़े को आपका नारा व कार्य भाया नही जबकि दलित को आपका आचरण सुहाया नही और आप लोकसभा में 5 तो विधानसभा में 47 पर अटक गए जबकि मोदी पिछड़े की बात कर आपको गटक गए।

अखिलेश जी! मैंने जय भीम कहा है वह इस नाते कि आप मुख्यमंत्री बने,नेताजी श्री मुलायम सिंह यादव जी व मायावती जी मुख्यमंत्री बनी या इस देश मे वंचित समाज का कोई व्यक्ति कुछ भी बना तो उसमें भीम राव अम्बेडकर जी का बहुत बड़ा योगदान है।सोचिए कि अम्बेडकर साहब ने कितने तिरस्कार के बाद हम सबको सत्ता,सम्पत्ति,सम्मान,शिक्षा,आरक्षण आदि का अधिकार भारतीय संविधान में दिलवाया है।अम्बेडकर साहब द्वारा संविधान के अनुच्छेद 340,341,342,16(4),15(4) आदि में हमे जो संवैधानिक अधिकार दिए गए हैं उन्ही की बदौलत मनु का आचार-व्यवहार सुसुप्त हुवा है और हम सम्मान की जिंदगी जी पा रहे हैं। हमने जय मण्डल भी कहा है जो पिछडो के लिए आज सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष श्री विंदेश्वरी प्रसाद मण्डल जी ने 1 जनवरी 1979 को मण्डल आयोग गठित होने के बाद दो वर्ष अनवरत कार्य करने के उपरांत 31 दिसम्बर 1980 को अपनी रिपोर्ट प्रेषित करने के बाद सिफारिश किया कि पिछडो को 27 प्रतिशत सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाय,पदोन्नति में आरक्षण को ग्राह्य बनाया जाय,न भरे गए पदों को 3 वर्ष तक आरक्षित रखा जाय,sc/st वर्ग की तरह पिछडो को आयु सीमा में छूट दी जाय,पदों के प्रत्येक वर्ग के लिए sc/st की तरह रोस्टर प्रणाली अपनायी जाय,राष्ट्रीयकृत बैंकों,केंद्र व राज्य सरकार के अधीन सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमो में आरक्षण दिया जाय,वित्तीय सहायता प्राप्त निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में आरक्षण लागू किया जाय,सभी कॉलेजों/विश्वविद्यालयो में आरक्षण प्रभावी बनाया जाय,पिछड़े वर्ग के छात्रों को ट्यूशन फ़ी फ्री किया जाय,किताब,वस्त्र,दोपहर का भोजन,छात्रावास,वजीफा एवं अन्य शैक्षणिक रियायते दी जाय,सभी वैज्ञानिक,तकनीकी एवं व्यवसायिक संस्थानों में पिछडो को आरक्षण दिया जाय,तकनीकी व व्यवसायिक संस्थानों में विशेष कोचिंग का इंतजाम किया जाय,लघु उद्योग लगाने हेतु पिछडो को समुचित वित्तीय व तकनीकी सहायता दी जाय,बंजर/ऊसर/बेकार भूमि का एक हिस्सा पिछडो को दिया जाय,पिछड़ा वर्ग विकास निगम बनाया जाय,राज्य व केंद्र स्तर पर पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्रालय गठित किया जाय एवं केंद्र सरकार द्वारा पिछडो को समुचित धन देकर मदद किया जाय।

अखिलेश जी! अम्बेडकर साहब द्वारा रचित संविधान में अनुच्छेद 340,341,342,15(4),16(4) आदि की बदौलत sc/st/obc आज आरक्षण पाकर उन्नति की सीढ़ियां चढ़ रहा है तो मण्डल साहब की सिफारिशों की बदौलत पिछड़ा देर से ही सही चपरासी से लेकर कलक्टर तक बन रहा है,ऐसे में ये हमारे समाज और हमारी पार्टियों के लिए आदर्श हैं।अखिलेश जी!देश का सँविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ लेकिन पिछडो को उनका संवैधानिक अधिकार मण्डल कमीशन 7 अगस्त 1990 को घोषित हुवा,13 अगस्त 1990 को अधिसूचित हुवा तो कोर्ट द्वारा क्रीमी लेयर के साथ 16 नवम्बर 1992 को लागू हुआ।अखिलेश जी! देश की 52 प्रतिशत आबादी जो पिछड़ा वर्ग मानी गयी है उसमें 43 प्रतिशत हिन्दू आबादी तो 9 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है।हिंदुओ में ब्राह्मण,क्षत्रिय,मारवाड़ी,कायस्थ,भूमिहार व sc/st को छोड़कर सभी पिछड़े कहे गए तो मुस्लिम में शेख,सैयद,पठान को छोड़कर सभी पिछड़े माने गए हैं।इन पिछड़े हिन्दू व मुसलमानों को जिनकी आबादी मण्डल साहब ने 52 प्रतिशत मानी 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश किया।

अखिलेश जी! देश के संविधान के अनुसार प्राप्त अधिकार के तहत पिछडो को आरक्षण के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े हैं।सवर्ण लोगो ने देश के रेल,बस को फूंक कर इस सांवैधानिक प्राविधान को रोकने का भरपूर प्रयास किया है जिसमे गाहे-बगाहे आप भी 2012 से 2017 के अपने सरकार में शामिल रहे हैं।मायावती जी ने भी पिछडो के त्रिस्तरीय आरक्षण का विरोध कर अपने सर्वजनवादी मुखौटे को सामने लाकर आरक्षण की अवधारणा को धूल धूसरित किया है।अखिलेश जी!आपने पदोन्नति में आरक्षण का प्रत्यक्ष विरोध करके जहाँ आरक्षण को कमजोर बनाया और खुद भी कमजोर हुए हैं तो वहीं मायावती जी ने सत्ता में रहते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार वंचित तबकों के समुचित भागीदारी की गणना कराने की बजाय सतीश चंद्र मिश्र जी को खुश करने व अपने सर्वजनवादी स्वभाव को एक्सपोज करने के लिए पुनः सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल कर पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था को निष्प्रभावी बनाने का अपराध किया है।

अखिलेश जी! आप और मायावती जी सवर्ण तुष्टिकरण में इतने तल्लीन हो गए कि आपलोगो का मूल आधार ही खिसक गया।जिस आधार को बनाने में लोहिया से लेकर रामसेवक यादव,कर्पूरी ठाकुर,रामनरेश यादव,वीपी सिंह ने अनगिनत गालियां सुनी,कांशीराम साहब ने फजीहत झेली और आप को एवं मायावती जी को एक ठोस आधार दिया उसे आप दोनों लोगों ने सर्वजनवादी नीति अपनाके खुद ही दरका डाला है।अब आप लोगो को खुद की नीति में सुधार व प्रायश्चित करना है वरना न आप लोगो का अस्तित्व बचेगा और न बहुजन वाद/समाजवाद जीवित रह पाएगा।

अखिलेश जी!आपने यूपी के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी का बयान जरूर पढा होगा जिसमें उन्होंने कहा है कि "अब समाजवाद नही,राष्ट्रवाद की जरूरत है।"भाजपा का मनुवादी स्वरूप अब धीरे-धीरे सामने आता जा रहा है।वे अब राष्ट्रवाद मतलब मनुवाद पर खुलकर बोलने लगे हैं।स्पष्ट है कि वे बोलें भी क्यों नही,क्योकि अब उनका प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति,राज्यसभा,लोकसभा,देश की सूबाई सरकारों में बहुमत जो हो गया है।अब तो उन्हें अपने एजेंडे को लागू करने में कोई कठिनाई नही दिख रही है क्योंकि विपक्ष अत्यंत कमजोर व दिशाहीन स्थिति में लकवा ग्रस्त खड़ा है।

अखिलेश जी!आपने भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी जी का भी बयान पढ़ लिया होगा जिसमे उन्होंने कहा है कि "भाजपा आरक्षण को वहां पंहुचा देगी जहां आरक्षण का होना और न होना बराबर होगा।"अखिलेश जी!यह वक्त अत्यंत सोचनीय है।देश अजीब तरह की खाई में जा रहा है जिसे हमलोग खुद खोदे हुए हैं।इस स्थिति से देश व वंचित समाज को बचाना होगा जिसके लिए आपको अब खुलकर सामने आना होगा।
अखिलेश जी! आपका आबादी के अनुपात में आरक्षण देने की मांग वाला यह बयान बुझ रहे सामाजिक न्याय के दीपक में तेल डालकर जलाने के प्रयास वाला बयान है जिसे सुनकर हमारे जैसे तमाम लोगों को खुशी हुई है लेकिन इसे मैं नाकाफी मानता हूं।

अखिलेश जी!आरक्षण पर अब आरपार के जंग की जरूरत है।यदि आप चूक गए तो दुनिया की कोई ताकत नही है जो यूपी के यादवो को भाजपाई होने से रोक दे क्योकि आप देख ही रहे हैं कि कितने बड़े-बड़े सेक्युलर लोग और यादव भाजपा के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को वोट कर गए है?कैसे भाजपा सरकार की यादव नेतृत्व द्वारा आपको नीचा दिखाने के लिए तारीफ की जा रही है?भाजपा कैसे यादवो को जोड़ने की कवायद शुरू कर दी है।बिहार में लालू जी और युवा तेजश्वी यादव जी के कारण यादवो का भाजपाईकरण नही हो पा रहा है लेकिन यूपी उनके टारगेट पर है क्योकि यहां अब तक उन्हें सामाजिक न्याय का एजेंडा सपा-बसपा द्वारा अपनाया जाता हुवा दिख नही रहा है।

अखिलेश जी! मुझे अंदेशा है कि भाजपा यूपी के यादवो को साधने के लिए भूपेंद्र यादव जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना सकती है तो संविधान संशोधन कर अहीर रेजिमेंट का निर्माण भी कर सकती है।भाजपा ऐसा कर एक तीर से दो निशाने कर डालेगी।एक यूपी के यादव नेतृत्व को हड़प लेगी तो दूसरे अहीर रेजिमेंट बना मण्डल को निगल जाएगी।अखिलेश यादव जी!सतर्कता जरूरी है।आप मण्डल कमीशन पूर्ण रूप से लागू करने की मुहिम शुरू करें।आपने आबादी के अनुपात में आरक्षण की जो बात की है उसके लिए जातिवार जनगड़ना की जरूरत पड़ेगी इसलिए समाजवादी पार्टी को दूसरे सारे एजेंडों को छोड़ करके सीधे-सीधे सामाजिक न्याय के एजेंडे को अख्तियार करना चाहिए।समाजवादी पार्टी को जातिवार जन गड़ना कराने, आबादी के अनुपात में आरक्षण देने,प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण को प्रभावी बनाने,न्यायपालिका में आरक्षण को लागू करने,मण्डल कमीशन की समस्त संस्तुतियों को लागू करने का अभियान छेड़ना चाहिए।

अखिलेश जी!वक्त बहुत नाजुक दौर से गुजर रहा है। फासिस्ट ताकतें फन फैलाने लगी हैं,फैलाएं भी क्यो नही,उनकी एक छत्र सत्ता जो कायम हो गयी है। राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री,उपराष्ट्रपति,देश के बहुसंख्य राज्यो में सरकारे भाजपा की हो चली हैं।अब वक्त भाजपा के पाले में है। वे संविधान बदलें,आरक्षण खत्म करें,मनु विधान लागूं करें,उनकी मर्जी क्योकि विपक्ष सुस्त और दिशाहीन हो चुका है। अखिलेश जी! भाजपा और उसके हिंदुत्व का एक मात्र काट मण्डल,आरक्षण,भागीदारी है।

अखिलेश यादव जी!हो सकता है कि आपको मेरी बात बुरी लगे लेकिन मैं आपका शुभेच्छु हूँ। कुछ लोग हैं जो आपके चेहरे पर लगे दाग को यह कहकर सराह सकते हैं कि "दाग है तो क्या अच्छा है" लेकिन मैं आपके समक्ष पूर्व में भी आईना रखता रहा हूँ और अब भी रखूंगा क्योकि मुझे आपसे और अपने वर्गीय हित से स्नेह और लगाव है।

अखिलेश जी! मैं आपका कोई प्रतिद्वंदी नही हूँ,मैं आपका एक छोटा सा कार्यकर्ता हूँ लेकिन मुझे अपने समाज और वंचित तबके की फिक्र है,समाजवादी पुरखो की ललकार का इल्म है और मुद्दों का ज्ञान है इसलिए मैं आपको आगाह करूँगा क्योकि यह समय बहुत नाजुक है,चूक गए तो खत्म होने की शुरुवात हो जाएगी।

अखिलेश जी! पुल, सड़क,मेट्रो,रिवर फ्रंट,एक्सप्रेस वे जरूरी हैं लेकिन इनसे जरूरी वंचित तबकों की तरक्की है।इस देश के पिछ्डों,अल्पसंख्यको व दलितों के शिक्षा,सम्मान,सुरक्षा,रोजगार की आवश्यकता सबसे महत्वपूर्ण है।इन सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से वंचित तबकों की कीमत पर मेट्रो,रिवर फ्रंट,एक्सप्रेस वे का कोई मोल नही है।यदि ये तरक्की किये तो आप,आपकी पार्टी,प्रदेश एवं देश तरक्की करेगा इसलिए अखिलेश जी आरक्षण,संविधान,भागीदारी,पिछड़ापरस्ती,दलित हित, अल्पसंख्यक सुरक्षा समाजवादियों का एजेंडा था और रहना चाहिए,यदि आप इससे विरत हुए तो भाजपा का हिंदुत्व,छद्म राष्ट्रवाद और मनुवाद मजबूत हो जाएगा।

अखिलेश जी! मैं इस उम्मीद के साथ 7 अगस्त की क्रांतिकारी बेला में अनुरोध करता हूँ कि मण्डल कमीशन पूर्णतः लागू करने का अभियान शुरू करना चाहिए।वीपी मण्डल की जयंती,पुण्य तिथि मनायी जानी चाहिए,समस्त पिछड़े /दलित महापुरुषों के चिंतन को आत्मसात करना चाहिए,निर्भय होकर पिछडो की बात उठानी चाहिये क्योकि यही आपकी मूल पूंजी हैं,जब आपकी मूल पूंजी मजबूत रहेगी तो ब्याज तो वैसे ही मिलता रहेगा इसलिए ब्याज के चक्कर मे अपनी मूल पूंजी गंवाने की गलती दुहराने की बजाय आप मजबूती से सामाजिक न्याय की अवधारणा को बलवती बनाएंगे यही उम्मीद है।
क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,
सादर,
भवदीय

चन्द्रभूषण सिंह यादव

9 मई 2017

लालू प्रसाद यादव को फसाने के मायने !

लालू प्रसाद यादव को फसाने के मायने !
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भारतीय राजनीति में जो भी हो लालू प्रसाद को कितना सीरियस लिया जाता है यह एक अलग बात है। लेकिन कुछ लोग बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि लालू प्रसाद यादव को सुना जाता है और उन्हें सुनने वाले लोग देश में बड़ी संख्या में आज भी उपस्थित हैं जिनमें दलित पिछड़े और अल्पसंख्यक मुख्य रूप से हैं कुछ सवर्णों को भी लालू प्रसाद यादव अच्छे लगते हैं जिन्हे सच से दुराव नहीं है। क्योंकि लालू प्रसाद यादव का दिमाग बिल्कुल साफ है कि वह स्पष्ट तौर पर समझते हैं कि किसकी कितनी भागीदारी राजनीति में होनी चाहिए बिहार जैसे प्रदेश में, उसी तरह देश में भी। जो लालू प्रसाद यादव को जानते हैं वह या उनके जैसा व्यक्ति था जिसने वहां के भूमिहारों को धराशाई किया ? और राजनैतिक रूप से वह उन्हें बताया की उनकी जगह क्या है। फिर उसी की भरपाई करने के लिए देश भर का सामंतवादी सोच का वह वर्ग हर तरफ से उनको फसाने का सफल प्रयास कर रहा है।

एक तरह से देखा जाय तो वैधानिक रुप से फंसा ही लिया है, लेकिन इस फसाने को हमें दूसरे तरह से भी देखना चाहिए कि जब अंग्रेजों का राज्य था तो वह हर उस आदमी को अपराधी बना देते थे जो उनका विरोध करता था। आज की तारीख में लालू प्रसाद यादव जैसा व्यक्ति समग्र रूप से उनका विरोध करता है और उनके विरोध को आम आदमी समझता भी है। अब यह आम आदमी की जिम्मेदारी बनती है कि लालू प्रसाद यादव के लिए न्याय की मांग सड़क पर उतर कर करें और सामाजिक न्याय के मसीहा को इतना समर्थन दें जिससे वह देश की असली आजादी को आम जन तक पहुंचाने में कामयाब हो सके।
यही अवसर है जब हम बगावत कर सकते हैं संस्था से जो इस तरह का षडयंत्र कर रहे हैं ? क्योंकि ऐसे कितने राजनीतिज्ञ, व्यापारी, उद्योगपति, अफसर या धार्मिकनेता लोग इस देश में हैं जो दूध के धुले हुए हैं और बिल्कुल साफ सुथरे हैं ? यह आवाज बुलंद होनी चाहिए सबसे पहले उसे पकड़ा जाए जिसकी वजह से देश में आज तक बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का लिखा हुआ कानून / संविधान ठीक से लागू नहीं हो सका और अगर ठीक से लागू हुआ होता तो आज इस तरह से लोगों को जातियों को नाम पर फसाया न जाता। क्योंकि जगन्नाथ मिश्रा जाती विशेष के नाते कहीं नज़र नहीं आ रहे हैं ? जबकि सारा जहर उनका है जिसका असर लालू प्रसाद पर हो रहा है। उधर जाति विशेष के आधार पर न्यायाधीश को न्यायाधीश द्वारा ही जलील किया जा रहा है और उसे जेल किया जा रहा है जो भारत के इतिहास का पहला मामला है।
ऐसे में सामाजिक न्याय की बात करने वाले सामाजिक न्याय के चिंतकों को भक्तों को सड़क पर आना चाहिए और कानून एक जैसा हो ! संविधान एक जैसा सबके लिए है। इसपर आंदोलन खड़ा करना चाहिए और राजनीतिक रूप से फसाया जा रहे व्यक्तियों को हमें ताकत देना चाहिए जिससे वह सामाजिक न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ा सकें।
मुझे तो यही लगता है की यदि लालू प्रसाद पांडेय होते तो ऐसा न होता ?
डॉ. लाल रत्नाकर 

पराजय भी हमारे लिए एक पाठ ही होती है

डॉ. लाल रत्नाकर 

कई बार हम परास्त हो जाते हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे हम खत्म हो गए हैं जबकि ऐसा होता नहीं हमारी पराजय भी हमारे लिए एक पाठ ही होती है यह भी हमारे अंदर कहीं ना कहीं कोई ना कोई ऐसी कमी है जो लोगों को पसंद नहीं आ रही है इस बीच में जब अपने पुराने क्षेत्र में घूम रहा था तो कुछ ऐसी जानकारियां और बातचीत में लगा की राजनीति को लोग अपने अधिकार और अपनी संपत्ति समझने लगे हैं ।

जबकि ऐसा नहीं है लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने कहने और यहां तक की उस पर चलने की बड़ी जरूरत होती है। यदि हम राजनीति में प्रतिनिधित्व करने के लिए पद के रूप में कोई भी पद हासिल करने का जो भी जुगाड़ करेंगे देर सवेर जनता उसे समझ जाएगी और उसे एहसास होगा कि हमने अपना प्रतिनिधि चुना है। या एक ऐसे महत्वाकांक्षी व्यक्ति चुना है जो हमें अपना गुलाम समझता है। जबकि लोकतंत्र में गुलामी नहीं होती लोकतंत्र बहुत ही मर्यादित तरीके से समाज के लिए काम करने का वह क्षेत्र है जहाँ त्याग और उदारता का बहुत महत्त्व है, जरुरत है। जबकि आज बहुत सारे लोग अति महत्वाकांक्षा में यह जानते हुए अति उत्साहित है कि वह जीत गए हैं और सदा के लिए जीत गए हैंजबकि ऐसा नहीं है।

जनता सब कुछ देख रही है मैं कल जिस कार्यक्रम में था वहां पर एक ऐसे व्यक्ति से मुलाकात हुई जो अभी 15 वी सदी में जिंदा है। जबकि उस कार्यक्रम में पाखंड के खिलाफ कुछ नए तरह के प्रयोग जिन्हें सामाजिक न्याय के पुरोधाओं ने शुरु किया है पर आयोजन था लेकिन किसी पक्ष का संबंधी होने के नाते जिस तरह से वह परब्रम्ह महामानव ईश्वर और पाखंड को ले करके उत्तेजित था उससे लग तो नहीं रहा था कि वह अपढ़ होगा लेकिन यह भी नहीं लग रहा था कि वह सही पढा भी होगा यदि इसी तरह के लोग समाज में नए परिवर्तनों का विरोध करते रहे तो वैसे ही जल्दी कोई इन परिवर्तनों के लिए तैयार भी नहीं होगा। ऐसे लोगों के आने से यह सारा आंदोलन कहीं बिखरता नजर आता है। जिसे संभालने की जरूरत है।

दूसरी ओर एक ऐसे राजनेता से भी मुलाकात हुई जो बहुत कम मतों से इस बार परास्त हुए हैं उनका दर्द अलग तरह का हैं, उनकी पीड़ा अलग तरह की है, उनके शत्रु अलग तरह के हैं उनके मित्र अलग तरह के हैं, लेकिन सब कुछ मिला करके यह लगा कि राजनीति में उनकी अप्रोच केवल और केवल अवसरवादी तात्कालिक सफलता की पराकाष्ठा को समझ पाई है ।


राजनीति हमेशा पराजय से बड़ी होती है यदि पार्टियों की बात करें तो सदियों से भाजपा हार रही थी और हारते-हारते आज वह देश में जीत गई है जो लोग वहां बने हुए हैं उनके दीर्घजीवी कार्यक्रम हैं। यही नहीं अन्यत्र लोग जीतते हारते हैं यहाँ विचार है जो जीते हैं ? अन्यत्र तो राजा हो गए और राजा होकर जो मर गए और वह नहीं हुए ? यदि वे सजग हुए होते तो सजग को वो जैसे ठगते रहे लूटते रहे उनकी वजह से जो आज सरोकारों से संपन्न समाज और आज वह पूरा जग ठगा गया है। 

आज जो हमारा नेता है वह समझता है कि वह लोगों को जल्दी से जल्दी ठग ले और वह जनप्रतिनिधि हो जाए और उसके जनप्रतिनिधि हो जाने से समाज के सारे संकट ख़त्म हो जाएंगे ? क्या खत्म हो जाएंगे अब तक जितने लोग इस तरह से जन प्रतिनिधि हुए हैं उन्होंने कितना समाज को बदल पाया है यह वह कितना समाज को बदलने का प्रयास कर रहे हैं यह सब देखते हुए राजनीति केवल सफलता की जगह नहीं है राजनीतिक परिवर्तन की जगह है और अगर परिवर्तन सामाजिक लेवल पर होगा तो जीत भी दूरगामी होगी और समाज बदलेगा तो राज भी बदलेगा अगर इनसे कोई पूछें पिछले दिनों जो लोग अपने को बदल करके यह बता रहे थे कि वह बहुत विकास कर गए हैं तो जनता ने उन्हें बता दिया यह विकास आपने अपना किया होगा जनता का कोई विकास नहीं किया है तो हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हम राजनीति कर किस लिए रहे हैं अपने विकास के लिए या लोकतंत्र में अपनी आवाज बुलंद करने के लिए जनता की विकास की। यद्यपि लालू प्रसाद जैसे लोगों को फ़साने का जो प्रयास है उसके पीछे उनकी राजनितिक समझ तो है पर मुलायम सिंह ने क्या किया ?

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